काॅलम-जनता के रखवाले-रामकृष्ण परमहंस पाण्डेय

लाकडाउन प्रभावित क्षेत्रों में शराब की दुकानें बंद हैं। शराब का अवैध कारोबार न होने पाए इसके लिए पुलिस भी एड़ीचोटी का जोर लगा रही है। परंतु वैध तरीके से लाकडाउन प्रभावित क्षेत्रों तक शराब पहुंचने लगे तो पुलिस भी क्या करे। असल में नगर निगम व ग्रामीण क्षेत्रों की सीमा से लगी कई शराब दुकानों को खोलने पर पाबंदी नहीं है। बेलखाड़ू, भेड़ाघाट का मीरगंज चौक, गौर तिराहा बरेला समेत कुछ अन्य स्थान हैं जहां शराब दुकानें खुली हैं जिनका शटर उठने से बंद होने तक पियक्कड़ों की भीड़ लगी रहती है। शहरी सीमा में वाहन चेकिंग के दौरान किसी को शराब के साथ पुलिस पकड़ लेती है तो बड़े सधे अंदाज में वह जवाब देता कि साहब गांव में खेत देखने चले गए थे। लौटते समय दुकान खुली मिल गई तो सोचा एक-दो बोतल लेते चलें। कुल मिलाकर बंद होकर भी शराब कारोबार आबाद है।

गाड़ी पर अधिकार किसका: कुछ पुलिस थानों में यह बसह छिड़ गई है कि थानों के नाम पर आवंटित चार पहिया गाड़ी पर किसका अधिकार है। गाड़ी थाने की है या फिर थाना प्रभारी की। असल में हो यह रहा है कि अनेक प्रभारी थाने से कई किलोमीटर दूर निवास करते हैं। घर तक आवागमन के लिए थाने की गाड़ी का उपयोग करते हैं। शहर से लेकर देहात तक कई थानों में यही होता आ रहा है। जबलपुर-कटनी मार्ग पर गांव से शहरी सीमा में आए एक थाने की हालत चिंताजनक है। प्रभारी महोदय चार बार गाड़ी से घर तक जाते हैं। शहर के एक थाने के दुबले-पतले टीआइ सेट पर टास्क देने के बहाने धीरे से बोल देते हैं ’आ जाओ।’ वायरलेस सेट सुनने वाला कोडवर्ड समझ जाता है और थाने की गाड़ी साहब के घर के लिए निकल पड़ती है। प्रभारियों की इस हरकत से अपराधियों की धरपकड़ व पेट्रोलिंग का काम हाशिए पर है। डीजल भी फुंक रहा है।

मत करो ऐसा अन्याय, ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाओगे: विक्टोरिया अस्पताल के कोविड वार्ड में भर्ती महिला को कागजों में रेमडेसिविर इंजेक्शन लगा दिया गया। कुछ दिन बाद उसे घोटाले का पता चल पाया। बात अधिकारी तक पहुंची तब जाकर हकीकत में रेमडेसिविर इंजेक्शन लगाया गया। महिला को बहुत दुख हुआ। उसने कर्मचारियों से कहा कि कोरोना महामारी में मरीजों के साथ अन्याय न करो, ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाओगे। तब तक दूसरे वार्ड से खबर मिली कि पहले से किडनी रोग से ग्रस्त कोरोना पीडि़त युवक को भी कागज में रेमडेसिविर लगा दिया गया। रेमडेसिविर घोटाले पर कर्मचारी चर्चा करने लगे। बोले ऊपर से नीचे तक बहुत कुछ कागजों में ही चल रहा है। कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या, मौतों के आंकड़े कागजी हो गए हैं। बड़े-बड़े अधिकारी कागजी आंकड़ों से पेश कर कुर्सी बचा रहे हैं, फिर हम तो कागज में सिर्फ इंजेक्शन ही लगा रहे हैं।

सरकारी अस्पतालों में बेच रहे पलंग, फैला जाल: गाडरवारा में बैठै दलाल ने 10 हजार रुपये में मेडिकल कॉलेज अस्पताल के कोविड वार्ड में बिस्तर की व्यवस्था करवा दी। सतना से आए कोरोना संक्रमित मरीज को यहीं भर्ती कराने स्वजन को 15 हजार रुपये मेडिकल के बिचौलियो को देने पड़े। जिन मरीजों के लिए बिस्तर खरीदे गए वे अपनी पहचान उजागर नहीं करना चाहते, परंतु मेडिकल के बिस्तर बेचने वाले मानवता के दुश्मनों को बेनकाब किया जाना चाहिए। मेडिकल के अधिकारी, डॉक्टर, कर्मचारी, नर्सिंग स्टाफ मरीजों की जान बचाने दिन रात मेहनत कर रहे हैं परंतु हजारों रुपये में बिस्तर की सौदेबाजी कर छवि धूमिल कर रहे हैं। दलालों ने कई जिलों में नेटवर्क फैला लिया है। सरकारी हों या निजी अस्पताल बेहतर होगा कि पंजीयन काउंटर पर कोविड वार्ड में पलंग की स्थिति डिस्प्ले होती रहे। दलाली व शोषण का खात्मा चाहने वाले यह व्यवस्था कर सकते हैं।

Posted By: Ravindra Suhane

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