जनता के रखवाले : रामकृष्ण परमहंस पाण्डेय

मिलावटखोर जाति बिरादरी वालों से एक साहब बेहद परेशान हैं। घरेलू उपयोग की कास्मेटिक सामग्री से लेकर नकली नोट छापने तक बिरादरी वालों के कारण साहब को मन मसोसकर रहना पड़ा। जब भी बिरादरी वालों पर कार्रवाई होती है, वे वहां टपक पड़ते हैं। ऐसा लगता है कि बिरादरी वालों को बचाना चाहते हैं। ऐसी मेहरबानी के लिए पहले एक नेताजी का नाम लिया जाता था, परंतु अब साहब जग जाहिर होने लगे हैं। मिलावटखोरी के प्रकरण में शहर के सरहदी थाने में हुई कार्रवाई में साहब को लेकर चर्चा हो चुकी है कि चश्मे से बड़ा तो उनका मुंह है। बिरादरी वालों पर कार्रवाई के दौरान वे घटनास्थल पर पहुंचते हैं तो अधीनस्थ यह सोचकर झेंप जाते हैं कि उनसे गलती तो नहीं हो गई। अब यह चर्चा हो रही है कि मिलावट के धंधे में बिरादरी वालों की जड़ें गहरी हो चुकी हैं परंतु साहब ने कहां तक जड़ें फैला रखी हैं।

ड्यूटी करने बाहर क्यों जाए घरवाली : कुछ खंड चिकित्सा अधिकारियों ने अपनी-अपनी घरवाली को कोविड-19 के अंतर्गत संविदा नौकरी दिलवा दी, लेकिन ड्यूटी नहीं करा पाए। कोरोना संदिग्धों का सैंपल लिया न फीवर क्लीनिक में नजर आईं। जबकि इस काम के लिए सरकार पांच अंकों में वेतन दे रही है। आदिवासी बाहुल एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारी कहते हैं कि साहब ने अपनी मैडम को ही संविदा नौकरी दिलवा दी। उसके बाद से मैडम गायब हैं, जबकि वेतन निकल रहा है। कुछ कर्मचारी चटकारे लेकर बात कर रहे थे। एक ने कहा कि घोर अंधेरगर्दी है। कर्मचारी एक दिन ड्यूटी पर न आए तो साहब पिनपिनाने लगते हैं। यहां मैडम की शक्ल देखने तरस गए हैं। दूसरे ने कहा कि मैडम की शक्ल पर न जाओ। कोरोना महामारी को साहब ने अवसर बना लिया है। एक नेताजी की गोद में बैठकर लंबी लंबे-लंबे हाथ मार रहे हैं।

हवा किसकी निकली, गाड़ी या साहब की : जनता कर्फ्यू के दौरान पुलिस मोहकमे ’हवा’ की चर्चा होती रही। कुछ लोगों ने कहा कि साहब ने गाड़ी की हवा निकाल दी थी। कुछ लोगों ने इसका खंडन करते हुए कहा कि हवा तो साहब की निकली थी। मामले को यूं समझा जा सकता है। रात करीब 10-11 बजे मझोले साहब पेट्रोलिंग पर निकले। व्यापारिक क्षेत्र स्थित एक घर के बाहर खड़ी गाड़ी की उन्होंने हवा निकलवा दी। गाड़ी मालिक ने इसका विरोध किया। तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई। नीचे से ऊपर तक घटना की गूंज सुनाई दी तो अधिकारी हरकत में आए। एक दूसरे साहब ने रात में ही गाड़ी में हवा भरवाकर विवाद को ठंडा कराने का प्रयास किया। परंतु माफीनामा होने तक बहसबाजी का दौर जारी रहा। कप्तान साहब ने मझोले का कान खींचा, जिसके बाद उनकी हवा निकल गई और ज्ञान मिला कि हर जगह नहीं उलझते।

झेत्राधिकार का विवाद, अतिक्रमण पर नाराज : क्षेत्राधिकार को लेकर मझोले साहबों में शीतयुद्ध चल रहा है। वे एक-दूसरे की सीमा में अतिक्रमण से खफा हैं। एक मझोले साहब दूसरे से जूनियर हैं परंतु वे खुद को शहर का बॉस समझते हैं। दूसरे सीनियर जरूर हैं परंतु सहजभाव व्यक्तित्व के कारण छोटे बने रहते हैैं। वे खुद किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते हैं। पर उनकी टीम जब शहर में कोई बड़ी कार्रवाई करते है तो पहले वाले मझोले मन मसोसकर रह जाते हैं। कभी-कभी इसकी खीझ चेहरे पर झलक जाती है। कुछ जवान चटकारे लेकर बात कर रहे थे। एक ने कहा कि दोनों ने गजब की टसल है। बात-व्यवहार में एक उत्तर तो दूसरा दक्षिण है। कप्तान साहब ने भी ऐसी चकरी घुमाई है कि सांठगांठ के रास्ते ही बंद हो गए। एक टीम से संगाबित्ती हुई तो दूसरी निपटा रही है। अपराधी भी सकते में हैं कि किसे सेट करें।

Posted By: Brajesh Shukla

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