बहुत ही अच्छे हैं। चुनाव में वही दो-दो हाथ कर सकता है, जो नगर निगम का टैक्स, बिजली बिल के अलावा अन्य करों का भुगतान कर दे। इसके लिए चुनाव आयोग प्रत्याशियों से एनओसी यानी अनापत्ति प्रमाण पत्र मांगता है। फिर क्या है, कई विभागों की पौ-बारह हो जाती है। चुनाव लड़ने वाले सभी पुराने करों का भुगतान करने में देरी नहीं करते। जब इतना हो रहा है तो उन निर्माणों की गुणवत्ता वाली एनओसी भी लेना चाहिए, जो पूर्व पार्षदों ने कराए थे। काम अच्छे हुए अथवा नहीं, इसकी एनओसी इंजीनियर दें। इससे सड़क अथवा अन्य निर्माण कार्यों की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। हालांकि वर्तमान स्थिति को देखें तो इसमें खतरा भी बहुत है। अधिकांश निर्माण कार्य कैसे होते हैं, यह सभी जानते हैं। यदि वास्तव में ऐसा हुआ तो कुछ ही सालों में चुनाव लड़ने वाले कम होते जाएंगे।

बहुत नाराज हैं जमीन से जुड़े कार्यकर्ता

निकाय चुनाव में टिकटें पक्की-पूरी होते ही जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं में जमकर नाराजगी दिखी। हर गली-कूचे में इनका आक्रोश फूटता दिखाई पड़ रहा। किसी नए चेहरे को टिकट और उनकी एक बार फिर हुई उपेक्षा से क्षुब्ध ऐसे कार्यकर्ता पार्टी के बड़े नेताओं को पानी पी-पीकर कोसते नहीं थक रहे। उनकी भड़ास नेताओं के सामने भी निकल रही। नेता तो आखिर नेता है..वे टिकट के वंचित कार्यकर्ताओं को सांत्वना देने के अलावा और क्या कर सकते हैं। सच भी है, युवा अवस्था में आए थे पार्टी की सेवा करने। नए-नवाड़े पता नहीं कहां से कहां पहुंच गए और एक वे ठहरे जो अब तक जिंदाबाद-मुर्दाबाद में ही उलझे हैं। ऐसे कार्यकर्ताओं की गिनती हजारों में है, जिनकी चप्पलें घिस गईं, बाल झड़ गए, लेकिन आज तक टिकट के लिए नाम तक नहीं चला। अब उन्हें कौन समझाए कि जब जेब गरम होगी, तभी टिकट और जीत के निकट पहुंचोगे।

घूरें कि मुस्कुराएं, समझ ही नहीं आता

गांवों से लेकर शहरों तक चुनावी जनसंपर्क पूरे चरम पर है। पंचायत और नगरीय निकाय के चुनाव एक साथ होने के कारण्ा चुनाव से जुड़े प्रत्येक विषय पर गर्माहट होना स्वाभाविक है। चारों तरफ इतने चुनाव कि हर गली-नुक्कड़ पर चर्चाओं का दौर जो शुरू होता है, वह खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। पता नहीं चलता कब महापौर से शुरू हुई बात पंच तक पहुंच जाए। श्ाहरों से अधिक गांवों का माहौल गर्म है। यहां तो चारों तरफ प्रत्याशी ही दिखाई देते हैं। जिला पंचायत से लेकर जनपद, ग्राम पंचायत के दावेदार घूम-घूमकर गली-कुलियों में घुस रहे। इस कारण विरोधी प्रत्याशियों का बार-बार सामना होना स्वाभाविक है। ऐसे में समझ ही नहीं आता कि सामने वाले को देखकर घूरें अथवा मुस्कुराएं। कई गांवों में तो वाहनों और कार्यकर्ताओं की भीड़ साथ लेकर चलने की होड़ मची है। अब तो चुनाव की गर्मी नतीजों के बाद ही ठंडी पड़ेगी।

हमेशा क्यों नहीं करते जांच कार्रवाई

सरकारी सिस्टम ही कुछ ऐसा है कि जब तक सिर पर न बन आए, काम करते ही नहीं। अब जर्जर मकानों की जांच का अभियान ही देखिए, जब सिर पर वर्षा आई, तभी इसकी सुध ली। क्या यह माना जाए कि बाकी मौसम में लोग जर्जर मकानों में रह सकते हैं। बात केवल जर्जर मकानों की नहीं, मिठाई की जांच भी रक्षाबंधन, दीवाली के समय होती है। यानी बाकी दिनों में लोग मिलावटी मिठाई खा सकते हैं। अतिक्रमण भी तभी दिखता है, जब कई साल बीत जाते हैं। जब अतिक्रमण हुआ तब जिम्मेदार क्या करते रहे। और भी कई विभाग ऐसे हैं, जब तक कोई पुख्ता आदेश न हो कार्रवाई करने का नाम नहीं लेते। ऐसा भी माना जाता है, यह हर साल निभाई जाने वाली रस्म की तरह है। यदि निरंतर कार्रवाई चलती रही तो कुछ ही दिनों में काम खत्म हो जाएगा। आखिर काम भी मिलते रहना चाहिए।

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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