जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़ित ग्यारह साल की बच्ची को 27 सप्ताह 2 दिन का गर्भपात कराने की अनुमति दे दी। तीन स्त्री रोग विशेषज्ञ व एक मनोचिकित्सक के मेडिकल बोर्ड ने गर्भपात न कराने की राय दी। लेकिन अनचाहा गर्भधारण करने व दुष्कर्मी की संतान को जन्म देने के सदमे से बचाने के लिए जस्टिस नंदिता दुबे की एकलपीठ ने बच्ची के गर्भपात के लिए सर्वोत्तम व सुरक्षित मेडिकल सहायता के साथ तत्काल कदम उठाने के निर्देश दिए।

टीकमगढ़ जिले की निवाड़ी तहसील अंतर्गत एक महिला ने यह याचिका दायर कर कहा कि उसकी 11 वर्षीय अबोध पुत्री से उसके ही देवर ने दुष्कर्म किया। इसके चलते वह गर्भवती हो गई। अधिवक्ता कबीर पॉल ने कोर्ट को बताया कि टीकमगढ़ जिला एवं सत्र न्यायालय में याचिकाकर्ता ने गर्भपात की अनुमति देने के लिए आवेदन दिया। लेकिन खारिज कर दिया गया। उन्होंने दलील दी कि पीड़िता दुष्कर्मी की संतान को जन्म नहीं देना चाहती। लिहाजा, उसे गर्भपात की अनुमति दी जाए।

13 साल की बच्ची को दी थी अनुमति- 15 अक्टूबर को कोर्ट ने कमेटी गठित करने व 17 अक्टूबर को स्त्री रोग विशेषज्ञ व एक मनोचिकित्सक का बोर्ड बनाकर पीड़िता की जांच के निर्देश दिए थे। सोमवार को शासकीय अधिवक्ता अभय पांडे ने उक्त बोर्ड की रिपोर्ट पेश कर बताया कि बच्ची को गर्भपात की सीमा से 11 सप्ताह अधिक का गर्भ है। वह शारीरिक रूप से गर्भपात के योग्य भी नहीं है। उसे गर्भधारण व गर्भपात दोनों में ही खतरा है।

मेडिकल बोर्ड ने बच्ची पर गर्भ व बच्चे के जन्म के प्रभाव को लेकर कोई राय नहीं दी। उन्होंने दलील दी कि 19 जुलाई 2019 को हाईकोर्ट 13 साल की बच्ची को इन्हीं परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति दे चुका है। याचिकाकर्ता की ओर से भी इसके लिए रजामंदी जताई गई। इस पर कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि सरकारी अस्पताल या मेडिकल कॉलेज में विशेषज्ञों की देखरेख में तत्काल गर्भपात का इंजताम किया जाए।

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