जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। मैनेजमेंट कोर्स की फीस को बढ़ाने के लिए निजी कालेजों ने प्रशासन पर दवाब बना शुरू कर दिया है। कालेज फीस नियामक आयोग से तय फीस की मांग कर रहे हैं जबकि प्रशासन एक राशि तय करना चाह रहा है। इस निर्णय की खिलाफत कुछ कालेज कर रहे हैं उनका दावा है कि जब फीस का निर्धारण शासन स्तर पर हुआ है तो उसी के आधार पर क्यों स्कालरशिप दी जा रही है। बेहतर संस्थानों को ज्यादा शुल्क दिया जाए। इधर प्रशासन ने फिलहाल मामले पर कार्रवाई का दावा किया है।

क्या है मामला: जिला प्रशासन के स्कालरशिप विभाग की तरफ से जिले में करीब 20 करोड़ रुपये आरिक्षत वर्ग के लिए स्कालरशिप दी जाती है। इसमें सभी पाठ्यक्रम शामिल है। मैनेमेंट का कोर्स चलाने वाले संस्थान फीस बढ़ाने की मांग कर रहे थे। फिलहाल 25 हजार रुपये स्कालरशिप तय है। प्रशासन की तरफ से 45 हजार रुपये सालाना फीस स्कारशिप की रखी गई है। इधर कई कालेजों की फीस इससे ज्यादा है। वहीं कुछ ऐसे भी है जिनकी फीस इससे काफी कम है। कालेजों की फीस एडमिशन एंड फीस रेग्युलेटरी कमेटी के जरिए तय की जाती है। ऐसे में कालेजों का तर्क है कि उन्हें तय फीस के आधार पर ही स्कालरशिप दी जाए।

स्कालरशिप का खेल: निजी कालेज में स्कालरशिप का खेल नया नहीं है। कई कालेज सिर्फ स्कालरशिप के दम पर संचालित हो रहे हैं। यहां काल्पनिक विद्यार्थी प्रवेश लेते हैंं जो कभी कालेज नहीं आते हैं लेकिन उनके नाम पर स्कालरशिप जारी होती है। एक कालेज संचालक ने नाम नहीं प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों से उनके दस्तावेज लेकर प्रवेश दिया जाता है उनके नाम का खाता और पैसे निकालने के लिए बाउचर तक कालेज पहले ही भरवा लेते हैं ताकि स्कालरशिप मिलते ही पैसा निकाला जा सके।

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एमबीए की फीस 38 हजार सालाना करने का प्रस्ताव चल रहा है। कालेजों ने फीस बढ़ाने की मांग की थी। यदि फीस नियामक आयोग से शुल्क तय है तो इस बारे में पता किया जाएगा। हमारे पास फर्जी प्रवेश को लेकर कोई शिकायत नहीं है। स्कालरशिप बांटते वक्त प्रवेश लेने वाला विद्यार्थी संस्था में है कि नहीं इसकी जांच करने का अधिकार हमारे पास नहीं है। यदि कोई शिकायत आएगी तो कार्रवाई होगी।

आशीष दीक्षित, असिस्टेट डायरेक्टर, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण

Posted By: Ravindra Suhane

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