जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक याचिका का इस निर्देश के साथ पटाक्षेप कर दिया कि अनुकंपा नियुक्ति का शिकायत का एक माह के भीतर नियमानुसार निराकरण किया जाए। इस सिलसिले में शिकायत को गंभीरता से लेकर सुनवाई की जाए।

न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकल पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ता मंडला निवासी कौशल किशोर की ओर से अधिवक्ता सचिन पांडे ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता के पिता शासकीय सेवा में थे। उनका सेवा के दौरान निधन हो गया। इसके बाद उसने विभाग में अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन दिया। विभाग की ओर से पत्र जारी कर दस्तावेज पेश करने के लिए कहा गया। सभी दस्तावेज पेश करने के चार साल बाद भी अनुकम्पा नियुक्ति नहीं दी गई।

इस वजह से परिवार का भरण-पोषण मुश्किल हो गया है। याचिकाकर्ता की माली हालत ठीक नहीं है। इसलिए अनुकंपा नियुक्ति अनिवार्य है। इसका नियम भी है। इसके बावजूद परेशान किया जा रहा है। तरह-तरह की बहानेबाजी की जा रही है। सवाल उठता है कि जब प्रविधान है, तो अनुकंपा नियुक्ति देने में हर्ज क्या है। इसी तरह प्रत्येक आवेदक को हलकान करने का नियम क्यों बनाकर रखा गया है। इससे हाई कोर्ट आना पड़ता है। कानूनी प्रक्रिया में लंबा समय लगता है। कायदे से शासकीय विभागों को इस तरह का रवैया बदलना चाहिए। इसे लेकर हाई कोर्ट पूर्व में दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। इसके बावजूद मनमानी चल रही है। हाई कोर्ट ने तर्क से सहमत होकर याचिकाकर्ता के हक में आदेश सुना दिया।

Posted By: Ravindra Suhane

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