निकाय चुनाव के मतदान की तारीख नजदीक आते ही उम्मीदवारों ने मतदाताओं को रिझाने जनसंपर्क तेज कर दिया है। इस बार ज्यादातर पूर्व पार्षदों ने अपनी पत्नियों को चुनावी रण में उतारा है। बैनर, पोस्टरों में अपनी-अपनी पत्नियों के आगे अपना नाम भी लिखवाया है, ताकि वोटरों को भी पता चल सके कि ये अमुक नेता या पूर्व पार्षद की पत्नी है। इतना ही नहीे वे अपनी पत्नियों के साथ वोटरों के घर-घर पहुंच कर वोट देने अनुनय-विनय कर कर रहे है। जो वोटर भैया से भलीभांति परिचित है वे ये संत्वाना देते दिख रहे कि अच्छा तो ये भाभी जी है, मतदान में इनका पूरा ध्यान रखेंगे। क्योंकि इसके पहले वोटरों ने भाभियों को कभी देखा ही नही था। चूल्हा-चौका से उन्हें फुर्सत ही नहीं मिलती थी, पर ये राजनीति भी न.. जो न कराए कम है। हालांकि भाभी भले ही जीत जाए काम की बागडोर भैया ही संभालेंगे।

काबिल हाथों में कमान, पहल तो अच्छी है

देर से ही सही लाल बिल्डिंग ने केंद्रीकरण की अवधारणा छोड़ विकेंद्रीकरण की राह पकड़ ली है। जो अच्छी पहल कही जा रही है। शुरूआत रांझी जोन से हुई है। जहां ओहदे में छोटे अधिकारी को कमान न सौंपकर सहायक आयुक्त को बैठाया गया है। जानकारों का कहना है कि ये अच्छी पहल हो सकती है इससे न केवल जोन के नागरिकाें के काम आसानी से हो सकेंगे वहीं उन्हें छोटे-मोटे कामों के लिए मुख्यालय के चक्कर भी नही लगाने पड़ेंगे। करीब आठ वर्ष पहले सहायक आयुक्तों की नियुक्तियां ही इसलिए हुई थी कि वे जोन का कामकाज संभाल सके। लेकिन लाल बिल्डिंग में हावी अफसरशाही और चाटुकारिता के चलते अधिकारियों को जोन से दूर रखकर दीगर काम ही कराए गए। जोन में उन्हें बैठाया गया जो या तो अधिकारियों के चहेते थे या किसी नेता के खास। बहरहाल जो शुरूआत हुई वह विक्रेंद्रीकरण की पहली सीढ़ी ही है।

पार्किंग के हाल देख बिदक रहे वाहन मालिक

अफसरों ने भू-माफिया के चंगुल से सरकारी जमीन छुड़ा कर पार्किंग तो शुरू कर दी है। लेकिन वाहन मालिक यहां वाहन खड़ा करने के लिए तैयार ही नही हो रहे। क्योंकि पार्किंग स्थल को ढंग से विकसित किए बिना ही आनन-फानन में पार्किंग चालू कर दी गई है। न तो जमीन को अच्छी तरह से समतल किया गया है न ही लोगों को पार्किंग की तरफ आकर्षित करने जरूरी इंतजाम किए गए हैं। जरा सी वर्षा होने पर पार्किंग स्थल कीचड़ से लथपथ देख वाहन मालिक दूर से ही बिदक रहे हैं। सड़क पर जहां जगह मिली वाहन खड़ा कर रहे है। यातायात पुलिस भी सख्ती नही बरत रही कि वे सड़कों को छोड़ पार्किंग में वाहन पार्क करें। वहीं जानकारों का कहना है कि सिर्फ चारों तरफ से बाड़ लगा देने से पार्किंग नहीं बन जाती लोगों को आकर्षित करने के लिए भी कुछ नए बंदोबस्त किए जाने चाहिए।

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खुदे शहर की खुशियां

आधा शहर खुदा पड़ा है। अधिकारी और ठेकेदार अपनी ही मस्ती में मस्त है। पिछले छह वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी शहर स्मार्ट दिखना तो दूर किसी एक हिस्से की सूरत तक नहीं बदल पाई। स्मार्ट सिटी के लचर कामों से जनता त्राहिमाम कर रही है। सीवर लाइन के गड्ढे, खुले चेंबर हादसों को आमंत्रण दे रहे हैं। आस-पास के रहवासी गर्मियों में धूल और बारिश में कीचड़ से लथपथ होकर अपने घर पहुंचने विवश है। स्मार्ट रोड के नाम पर सामान्य सड़कें बनाई जा रही उसमें कई अधूरी है। अफसर बैठक दर बैठक कर ठेकेदार, अधिकारियों को घुड़की पर घुड़की दिए जा रहे पर काम है जो रफ्तार ही नही पकड़ पा रहे हैं। ये देखकर जानकार कह रहे है कि जनता की गाढ़ी कमाई तो लुटाई ही जा रही है अब तो खुदे शहर की खुशियां भी मनाई जा रही है।

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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