ब्रजेश शुक्ला, जबलपुर नईदुनिया। चार खंबा क्षेत्र में मां धूमावती का मंदिर 1500 साल से भक्तों की साधना स्थली है। यह जबलपुर का सबसे प्राचीन खेरमाई मंदिर है इसीलिए इसे बूढ़ी खेरमाई मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यहां नवरात्र में सुबह से लेकर रात भक्त पूजन करने के लिए पहुंचते हैं। यहां बाना चढ़ाने की विशेष परंपरा है।

इतिहास : आज से 1500 साल पहले यह क्षेत्र घना जंगल था। तब से यहां पर यह मंदिर स्थापित है। इतिहासकार डा. आनंद सिंह राणा बताते हैं कि यहां का दिवाला भारत में श्रेष्ठ है। दस में से सातवीं महासिद्धि काल्हप्रिया देवी, उग्र तारा देवी प्रलय काल में सबका विनाश होता है केवल धूमावती देवी ही विद्यमान रहती हैं। अवतरण के बारे में पुराणों में उल्लेखित है कि मां पार्वती ने क्षुधातुर होकर शिव को निगल लिया पर इससे क्षुधा तो शांत हो गई परंतु शिव के विष के प्रभाव से पार्वती के श्रीमुख से भयंकर धुंआ निकला और शरीर भयानक हो गया। शिव के आशीर्वाद से यही स्वरूप मां धूमावती के रूप में पूजित हुआ। यह विधवाओं की प्रमुख आराध्य देवी हैं।

बाना अर्पण करने की है प्रथा : यहां बाना अर्पित करने की प्रथा प्रचलित है। मन्नत पूरी होने पर बाना बूढ़ी खेरमाई को चढ़ाया जाता है और फिर जवारा विसर्जन के दिन धारण करते हैं। सबसे बड़ा बाना एक साथ 11 लोग पहनते हैं। बूढ़ी खेरमाई जबलपुर के विराट जवारा चल समारोह और शूलों के आसन पर अग्नि झूला चमत्कार से कम नहीं है। जिसे लोग विशेष रूप से देखने के लिए पहुंचते हैं। नवरात्र में प्रतिदिन श्रृंगार दर्शन होते हैं। विशेष रूप से पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी को पुष्पों से विशेष श्रृंगार होता है।

मैं 10 वर्ष की उम्र से प्रतिदिन बूढ़ी खेरमाई की सेवा कर रहा हूं। माई को छोड़कर और कहीं आने-जाने का मन नहीं करता। भगवती महामाई शक्तिपीठ में निरंतर साधनारत हूं। - राजू महाराज, पंडा

हर दुख दर्द मुसीबत में मां बूढ़ी खेरमाई हमारे साथ रहती हैं, माई के आशीर्वाद से ही निरंतर जीवन पथ पर बढ़ रहा हूं। मां के अलौलिक दर्शन मात्र से मैं अविभूत हूं। - उमेश राठौर, भक्त

Posted By: Brajesh Shukla

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