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जबलपुर। नईदुनिया रिपोर्टर

शिक्षक ही वह माध्यम है जिसके द्वारा भारतीय संस्कृति को समूचे विश्व में फैलाया जा सकता है, यह जिम्मा शिक्षक के कंधों पर है। शिक्षक को अपनी मूल भाषा में शैक्षिक शोध करते हुए शिक्ष् देना चाहिए। शिक्षक की दृष्टि में शोध होना चाहिए। यह बात डॉ.हरि सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर के कुलपति डॉ.बलबंत राय शांति लाल जानी ने कही।

डॉ. जानी प्रगत शैक्षिक अध्ययन संस्थान जबलपुर में शोधार्थी के रूप में शिक्षक परिप्रेक्ष्य और प्रविधियों की समझ विषय पर आयोजित कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। 16 से 18 जनवरी तक आयोजित इस कार्यशाला के शुरूआती सत्र में प्रो.अंबिकादत्त शर्मा(दर्शनशास्त्र विभाग) सागर विवि, इंदौर से देवी अहिल्या विवि से एसके त्यागी, संस्था प्राचार्य डॉ.आरके स्वर्णकार व समस्त अकादमिक सदस्यों के साथ प्रशिक्षणार्थियों की उपस्थिति रही। प्रो.त्यागी ने इस अवसर पर कहा कि शिक्षक हमेशा शोधार्थी होता है। डॉ.अंबिकादत्त शर्मा ने बताया कि जिस भाषा में आप स्वप्न देखते हैं अगर वही आपके विचार की भाषा नहीं बनी तो एक शोधार्थी में सृजनात्मकता कभी आ ही नहीं सकती। कार्यशाला में संस्था प्राचार्य डॉ.आरके स्वर्णकार ने स्वागत भाषण देते हुए शिक्षक के दायित्वों को रेखांकित करते हुए शोधार्थी के रूप में शिक्षक की भूमिका को स्पष्ट किया। कार्यक्रम में एमएड व डाइट के सदस्यों की सहभागिता रही। कार्यक्रम का संयोजन सहयोग डॉ.संजय शर्मा का रहा। संचालन डॉ.टीजी नियोगी व आभार डॉ.चित्रा शर्मा ने व्यक्त किया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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