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जबलपुर। नईदुनिया रिपोर्टर

हमें बचपन में दो रेखाएं पढ़ाई गई थीं, मकर रेखा और सरल रेखा। मनो बा सोई हमसे नई बनीं। हमें मार-मार के सिखाओ गओ कि दो बिंदुओं को मिलावे वाली रेखा का सरल रेखा कहत हैं, पर जा गरीबी रेखा का होत है जे तो हमें नई पढ़ाओ गओ। बुंदेली बोली की मिठास लिए कुछ इस तरह से नाटक के संवाद दर्शकों के दिल में उतर गए। अवसर था शहीद स्मारक प्रेक्षागृह में नाटक मौसाजी जैहिंद के मंचन का। यह आयोजन साझा रंगमंच के तरत किया गया। यह पहला प्रयास था जब शहर की रंगसंस्थाओं जिज्ञासा, रंगाभरण व इलहाम ने मिलकर आयोजन किया।

नाटक की खासियत

लेखक- उदय प्रकाश

नाट्य रूपांतरण- वसंत काशीकर

निर्देशक- वसंत काशीकर

प्रकाश- अक्षय ठाकुर

संगीत -निमिष माहेश्वरी

अवधि- 1 घंटा 20 मिनट

मंचन - 25वां

- नाटक में पात्रों का मेकअप, कॉस्ट्यूम और सेट विषयवस्तु को समेटे हुए रहा। नाट्य प्रस्तुति में सुहैल वारसी, निमिष माहेश्वरी और ब्रजेंद्र सिंह राजपूत का विशेष सहयोग रहा।

कलाकार- नमन मिश्रा, आयुष राय, शोभार उरकड़े, निमिषा नामदेव, ब्रजेंद्र सिंह, शुभम जैन, तरुण ठाकुर, आयुष राठौर, अर्पित तिवारी, संदीप धानुक, लोकश यादव, अमन मिश्रा, हिमांशु पटेल ने मंच पर अभिनय किया।

नाटक की कहानी- मौसाजी एक अद्भुत चरित्र हैं जो अपनी दुनिया में जीते हैं। वे एक गरीब बुजुर्ग ग्रामीण हैं लेकिन उनके जीने का अंदाज निराला है। मौसाजी बात-बात में आजादी की लड़ाई में अपनी हिस्सेदारी के किस्से सुनाते हैं। वो विपन्न हैं लेकिन कहते हैं गांव में उनकी एकड़ों से जमीन है। प्रत्येक किस्से के नायक वे स्वयं हैं। गांव वाले भी उनकी हालत व स्थिति को जानते समझते हैं। मौसाजी ने अपना एक झूठा संसार रच लिया है। उनके हिसाब से गांधी उनके दोस्त थे। मौसाजी के तीन पुत्र हैं जो छोटे-मोटे काम करके गुजारा करते हैं। पुत्र उनकी चिंता नहीं करते लेकिन मौसाजी हमेशा उनका गुणगान करते हैं। नाटक के अंत में मौसाजी को अपने छोटे पुत्र के कारण बहुत परेशान होना पड़ता है लेकिन फिर भी वो बड़ी-बड़ी बातें करना बंद नहीं करते।

Posted By: Nai Dunia News Network

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