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जबलपुर(नईदुनिया रिपोर्टर)। 'भेड़िए संसार में इंसानों के साथ ही आजाद हुए प्रतीत होते हैं। हालांकि इंसानों ने भेड़िए को आतंक और डर से जोड़ रखा है।'' अब भेड़िए जंगलों से तो गुम होते जा रहे हैं पर हमारी आबादी में पैठ गए हैं हमारे अंदर। जो खाए जा रहे हैं हमारे आदर्श, इंसानियत के सारे सवालात और छीनते जा रहे हैं भेष बदलकर जो भी जीवंत है हमारा।' कुछ ऐसे संवादों के साथ विवेचना रंगमंडल के 27वें राष्ट्रीय नाट्य समारोह रंगपरसाई-2020 में चौथे दिन नाटक- 'खारू का खरा किस्सा' का मंचन किया गया। जिसे दर्शकों ने सराहा।

नाटक की खासियत-

लेखक- सुमन कुमार

परिकल्पना व निर्देशन- प्रवीण शेखर

संस्था- बैक स्टेज, इलाहाबाद

प्रकाश- टोनी सिंह

संगीत- अमर सिंह, प्रियंका चौहान

ध्वनि- अमर सिंह

गायन- प्रियंका चौहान, आरोही सिंह

कोरस- अनुवर्तिका सोमवंशी, प्रज्ञा वर्मा, कोमल पांडे

धुन- प्रियंका चौहान

संगीत संचालन- अंजल सिंह, प्रवीण शेखर, अनुज कुमार

मंच - भास्कर, अनुज

वेशभूषा परिकल्पना- स्तुति, मिलन सिंह

वेशभूषा प्रभारी- अमर, अंजल

मेकअप- हमीद

कलाकारों में-

खारू- भास्कर शर्मा

खारू का पिता- सतीश तिवारी

खारू का बेटा- प्रज्ञा वर्मा, अंजल सिंह

भेड़िया-1- कौस्तुभ पांडे

भेड़िया- 2 अनुज कुमार

भेड़िया- 3 अमर सिंह

नटनी- 1- कोमल पांडे

नटनी-2 मेमना- अनुवर्तिका सोमवंशी

नटनी-3 प्रज्ञा वर्मा

खारू का पड़ोसी- दिलीप श्रीवास्तव

खारू का रिश्तेदार- प्रत्युष वार्ष्णेय

भेड़िया- भेड़- अमर, शुभम, दिलीप, अनुज, प्रत्युष, अनुवर्तिका, कोमल, अंजल, दिवेश, आलोक, नितीश, राकेश, सत्यम, ज्ञानेंद्र, प्रकाश, प्रदीप्त व अन्य सदस्यों का सहयोग रहा।

ऐसी रही कहानी- यह नाटक भुवनेश्वर की कालजयी रचना भेड़िए पर आधारित है। यह गरीबी व अभावों के बीच,इंसानी जिंदगी की घातक, परिस्थितियों और उनसे उबरने के उतने ही निर्मम फैसलों के द्वंद की कहानी है। जिजीविषा और क्या है? किसी भी सूरत में सबकुद दांव पर लगाकर बचे रहने की जद्दोजहद ही तो है। नाटक की कहानी में जिजीविषा से कहीं आगे जाकर ऐन फैसले की घड़ी में अपनों के लिए अपना जीवन भी झोंक देने की कहानी है। नाटक में दिखाया गया कि भेड़िए दरअसल सिर्फ पशु भेड़िए नहीं हैं, बल्कि इंसानी रूप में भी भेड़िए हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network