जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। हाई कोर्ट ने रेलवे में नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों रुपये ऐंठने के दो आरोपितों को जमानत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति सुजय पाल की एकलपीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता के निचली अदालत में बयान रिकार्ड दर्ज होने के बाद आवेदक नए सिरे से जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं। पीड़ित ने भोपाल के बजरिया पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि सुधीर दोहरे और राजेश दोहरे ने रेलवे में नौकरी दिलाने के नाम पर उससे 15 लाख रुपये की मांग की थी। इसमें से करीब आधा पैसा वह दे चुका है। आरोपितों ने उसे भरोसा दिलाया था उसकी नौकरी पक्की है। पीड़ित को काल लेटर, ट्रेनिंग लेटर और अन्य दस्तावेज भी दिए गए। इतना ही नहीं आरोपित उसे प्रशिक्षण दिलाने भुसावल भी ले गए। वहां दो माह रहने के बाद पीड़ित को समझ में आया कि उसके साथ धोखा हुआ है।लिहाजा, उसने कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी।

कानून की नजर में ब्याज की वसूली अनुचित, टिप्पणी के साथ महिला एसआइ से ब्याज वसूली का आदेश किया निरस्त : हाई कोर्ट ने कहा कि कानून की नजर में ब्याज की वसूली अनुचित है। इस टिप्पणी के साथ महिला एसआइ से ब्याज वसूली का आदेश निरस्त कर दिया गया। इसी के साथ रेलवे में पदस्थ जबलपुर निवासी महिला एसआइ मंजुल निगम ने राहत की सांस ली। हाई कोर्ट ने विभाग को ब्याज की राशि वसूलने से तो रोक दिया लेकिन मूलधन की वसूली के लिए स्वतंत्र कर दिया है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सचिन पांडे ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता 28 फरवरी, 2022 को सेवानिवृत्त हाेने वाली है। सेवानिवृत्ति की कगार पर रिकवरी की जा रही है। याचिकाकर्ता की आपत्ति मूलधन के साथ लगाए ब्याज की राशि को लेकर है। यह राशि आठ लाख 87 हजार 794 रुपये है। सेवाकाल में विभागीय गलती से याचिकाकर्ता को अधिक भुगतान कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के न्यायदृष्टांतों की रोशनी में इस तरह की गलती के लिए शासकीय कर्मी को सेवानिवृत्ति की कगार या सेवानिवृत्ति के बाद परेशान करना अनुचित है। इस मामले में याचिकाकर्ता मूलधन की अदायगी के लिए तैयारी है। ऐसे में ब्याज राशि वसूली का आदेश निरस्त किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट ने तर्क से सहमत होकर याचिकाकर्ता के हक में आदेश पारित कर दिया।

Posted By: Brajesh Shukla

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