जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। भारतीय विचार और संस्कृति का वाहक होने का श्रेय हिंदी को ही जाता है। अब संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में भी हिंदी की गूंज सुनाई देने लगी है। हमारे प्रधानमंत्री ने संयुक्त् राष्ट्र महासभा में हिंदी में ही अभिभाषण देकर इसके गौरव को बढ़ाने का कार्य किया है। हिंदी को जीने की कला विद्यार्थियों में विकसित करने का निरंतर प्रयास सभी को करना है।

ग्रामोदय से अंत्योदाय की संकल्पना राष्ट्रभाषा हिंदी से भही संभव है। यह बात रादुविवि कुलपति प्रो. कपिल देव मिश्र ने विवि के हिंदी व भाषा विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित हिंदी पखवाड़ा के समापन व अमृत महोत्सव के आनलाइन कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कही।

हिंदी राष्ट्रीय आंदोलन से भूमंडलीकरण तक विषय पर आयोजित हिंदी पखवाड़ा समापन व अमृत महोत्सव के आनलाइन कार्यक्रम के उद्घाटन में मुख्,य अतिथि उच्च शिक्षा मंत्री डा. मोहन यादव ने अपने संदेश में कहा कि आज देश को एकता की डोर में बांधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है तो वह हिंदी ही है। मप्र शासन स्तर पर ही हिंदी को बढ़ावा देने विशेष कार्य किए जा रहे हैं। वाचिक स्वागत व विषय प्रवर्तन करते हुए संयोजक व विभागाध्यक्ष डा. धीरेंद्र पाठक ने कहा कि हिंदी आम आदमी की भाषा के रूप में देश की एकता का सूत्र है। सभी भारतीय भाषाओं की बड़ी बहन होने के नाते हिंदी विभिन्न भाषाओं के उपयोगी और प्रचलित शब्दों को अपने में समाहित करके सही मायनों में भारत की संपर्क भाषा होने की भूमिका निभा रही है।

कार्यक्रम के मुख्य वकत राष्ट्रीय संगठन मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद श्रीधर पराडकर ने कहा कि एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति व संस्कारों की सच्ची संवाहक और परिचायक है। विशिष्ट अतिथि पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग प्रो. ित्रभुवननाथ शुक्ल ने कहा कि भाषा वही जीवित रहती है जिसका उपयोग जनता करती है। भारत में लोगों के बीच संवाद का सबसे बेहतर माध्यम हिंदी है। इस कार्यक्रम में रादुविवि कुलसचिव प्रो. ब्रजेा सिंह ने सभी अतिथियों का आभार देते हुए कहा कि ऐसे आयोजन पथ प्रदर्शन होते हैं। संचालन राखी चतुर्वेदी ने किया। इस अवसर पर डा. आशा रानी, डा. विपुला सिंह व डा. नीलम दुबे का सहयोग रहा।

Posted By: Ravindra Suhane

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