जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। राजनीति में महिलाओं की बराबर हिस्सेदारी करने के उद्देश्य से महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण का फार्मूला तैयार किया था, लेकिन कांग्रेस में चतुर-सुजान राजनेताओं ने इससे भी आगे जाकर महिलाओं की हिस्सेदारी को ही बराबर कर दिया। दरअसल बड़े क्षत्रपों ने अपने ही करीबी पुरुष नेताओं की पत्नियों और अन्य नजदीकी महिला रिश्तेदारों को टिकट दिलवाकर सारा गणित अपने हिसाब से बैठा लिया।

पार्टी के ही कार्यकर्ताओं का कहना है कि कांग्रेस के क्षेत्रीय क्षत्रपों ने पार्षदों के टिकट वितरण में जमकर मनमानी की। जितने भी विधायक या पराजित विधायक-प्रत्याशी रहे, उन्होंने जमकर मनमानी की। उन्होंने अपने-अपनों को टिकट दिलवाकर वर्षों से मैदानी स्तर पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं के हक पर कब्जा कर लिया। इसी का परिणाम है कि कांग्रेस की ओर से दर्जनों की संख्या में बागी अभी भी चुनाव मैदान में अड़े हुए हैं। तीन दशक से कांग्रेस के लिए राजनीति करती रहीं और पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ की जिलाध्यक्ष रहीं सुशीला कनौजिया का आरोप है कि जो महिला कार्यकर्ता सालों साल कांग्रेस के लिए दिन-रात एक किए रहीं- उनको भी कांग्रेस ने सम्मान नहीं दिया। उनका कहना है कि पुरूष नेताओं ने कभी अपनी पत्नियों को पार्टी के लिए सड़क पर नहीं निकलने दिया। लेकिन उनके वार्ड आरक्षित हो गए तो उन्होंने अपनी-अपनी पत्नी की आड़ में महिला आरक्षण को भी अपने मुताबिक भुना लिया। कमोवेश यह संक्रमण भाजपा में भी देखा जा रहा है, लेकिन भाजपा में यह बीमारी कांग्रेस जितनी गंभीर नहीं दिख रही।

पार्षद पतियों के हाथों में चाबी

पचास फीसदी सीटों पर भले महिला प्रत्याशियों को उतारा जा रहा है, लेकिन महिला प्रत्याशियों का पूरा काम उनके राजनेता-पति ही देखेंगे। चुनाव के बाद जीतने वाली अधिकांश महिलाओं के पति ही निगम में उनकी जिम्मेदारी निभाएंगे। महिला पार्षदों की सक्रियता सदन की बैठकों तक ही सीमित रहेगी।

Posted By: Mukesh Vishwakarma

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