बृजेश शुक्ला, जबलपुर। नईदुनिया। श्रीकृष्ण भक्ति एक धारा है। जिसमें भक्त भगवान के अलग-अलग नामों और रूप के साथ भक्ति करता है। ऐसा ही एक पंथ है जो भगवान के स्पर्श की हुई वस्तुओं की आज भी पूजा करता है। यह है श्री जयकृष्णी पंथ। जिनके महंत यह दावा करते हैं कि गुरु परंपरा के अनुसार इस पंथ के महंतों के पास भगवान के कपड़ों से लेकर सरौंता, सुपाड़ी के टुकड़े आइना सहित वे प्राचीन वस्तुएं हैं जिनका भगवान ने उपयोग किया था। जिसे यह पंथी धन के रूप में अपने पास रखते हैं। जबलपुर के श्री गोपाल मंदिर बाई का बगीचा में भगवान के कपड़े हैं। जिसे जन्माष्टमी सहित अन्य प्रमुख पर्वों पर पूजन किया जाता है।

1267 में शुरू हुआ था पंथ:

इस पंथ को 1267 ईस्वी में चक्रधर स्वामी ने शुरू किया था। वे परब्रह्म परमात्मा के अवतार हैं। जिन्होंने सनातन धर्म के लिए अनेक कार्य किए। चक्रधर स्वामी ने ही यह प्रमाणित किया कि परब्रह्म का अवतार द्वापर युग में श्रीकृष्ण हैं। भगवान चक्रधर स्वामी ने समाज को पांच अवतारों का दर्शन कराया। जिसमें भगवान श्रीकृष्ण, दत्तात्रेय महाराज, चक्रपाणी महाराज, गोविंद प्रभु और वे स्वयं।

60 तीर्थों की हैं शिलाएं

बताया जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण के 1650 तीर्थ हैं। इस मंदिर में 60 तीर्थों की शिलाएं मौजूद हैं। जिसमें मुख्य रूप से उत्तरप्रदेश के गोवर्धन पर्वत, महाराष्ट्र के रिद्धपुर, माहुर, फलटन, डोमेग्राम, बेलापुर, गुजरात के द्वारिका और मप्र के उज्जैन मुख्य रूप से शामिल हैं। जहां-जहां भगवान के चरण रज पड़े वहां के पत्थरों (पाषाण) को विग्रह के रूप में तैयार कर यह पंथ भगवान की प्रतिमा के पास स्थापित करता है। इस पंथ के पास आज भी 6500 से ज्यादा ग्रंथ संपदा है।

संभालकर रखते हैं पंथी धन

भगवान से जुड़ी वस्तुओं को इस पंथ के महंत बड़े संभालकर रखते हैं। महंत कृष्णराज बाबा बताते हैं कि इस पंथ के मुख्य 13 महंत थे। जिनके पास भगवान के उपयोग की हुई कोई न कोई वस्तु थी। इस परंपरा में गुरु अपने शिष्यों को समान रूप से पंथी धन देता है। जबलपुर में भगवान के वस्त्र के रूप में रेशम के छोटे-छोटे टुकड़े हैं। इन्हें विशेष तौर पर मढ़वाकर कई परत के अंदर रखा जाता है।

1980 में हुई थी मंदिर की स्थापना

बाई का बगीचा स्थित श्री गोपाल मंदिर की स्थापना 1980 में हुई थी। इसके बाद मूुर्ति स्थापना 1984 में की गई। छिंदवाड़ा में जन्मे महंत दत्तराज बाबा भक्तों के अनुरोध पर 1967 में अमरावती आश्रम महाराष्ट्र से आए थे। गीता मंदिर में सेवा करते हुए वे 1972 में निवृत्त हो गए थे। यहांसुंदरलाल पांडे ने कुछ जमीन दान में दी और कुछ जमीन उन्होंने खरीदी। अपनी जमीन बेचकर और क्षेत्रीय लोगों की सहायता से 1980 में मंदिर बनवाया। इसके बाद 1993 में गोलोकवासी हुए। इसके बाद महंत कृष्णराज एवं परिवार ने 2002 में मंदिर का कलशारोहण किया।

इनका कहना है

मेरे गुरु महंत दत्तराज बाबा ने परंपरानुसार भगवान के कपड़े दिए थे, जिसे खास तौर पर मढ़वाया गया है जिससे वह खराब न हो। इसे जन्माष्टमी, छठी और अन्य त्योहार में भगवान के पूजन में शामिल किया जाता है। यह पंथी धन है।

- महंत कृष्णराज बाबा, श्री गोपाल मंदिर, बाई का बगीचा

रिपोर्ट- बृजेश शुक्ला

फोटो एवं वीडियो- विनेश सिंह

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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