जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। सड़ी -गली सब्जियों से जैविक खाद बनाने के लिए नगर निगम ने शहर में दो कंपोस्ट प्लांट तो लगवा दिए, लेकिन ठेके पर दिए प्लांट नगर निगम के लिए घाटे का सौदा साबित हुए। प्लांट के संचालन से अंजान जनता को न तो सस्ती जैविक खाद मिल पाई और न ही निगम की कमाई हो पाई।

स्वच्छ सर्वेक्षण 2021 में भी सर्विस लेवल प्रोसेस (साफ-सफाई कूड़ा संग्रहण व निस्तारण) में नंबर भी कम हो गए। दरअसल नगर निगम ने बलदेवबाग में 20 विंक्टल और कठौंदा स्थित स्वच्छता पार्क में करीब 300 टन का ग्रीन वेस्ट कंपोस्ट प्लांट स्थापित किया था। मकसद यही था कि प्लांट के माध्यम से सब्जी मंडियों से निकले वाले गीले कचरे यानी सड़ी-सब्जियां, फूल-पत्तियों से जैविक खाद बनाई जा सके। जिसका उपयोग शहर के बाग-बगीचों के लिए किया जा सके और नागरिकों को भी बेचा जा सके। लेकिन कचरा संग्रहण की लचर व्यवस्था के कारण प्लांटों को भरपूर गीला व हरा कचरा नहीं मिल पाया और प्लांट स्थापना के कुछ माह बाद ही बंद हो गए। कंपोस्ट प्लांट करीब दो वर्षों से बंद पड़े हैं। इसका खामियाजा शहर को स्वच्छ सर्वेक्षण 2021 में भुगतना पड़ा। शहर स्वच्छ सर्वेक्षण में 17 से सीधे 20 पर आ गया।

रोजाना नहीं मिला गीला कचरा: दरअसल बलदेव स्थित कंपोस्ट प्लांट को दिन रोजाना दो टन और कंठौदा प्लांट के लिए रोजाना 30 से 40 टन कचरे की आवश्यकता होती है। लेकिन कचरा वाहनों के माध्यम से अलग-अलग सूखे और गीले कचरे का संग्रहण न किए जाने से पर्याप्त गीला कचरा प्लांट तक नहीं पहुंच पाया। हुआ ये कि कुछ माह प्लांट चलने के बाद बंद हो गए। हालांकि नगर निगम अब जल्द ही अपने स्तर पर प्लांट चालू कराने का दावा कर रहा है।

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ये अंतर जो जिससे इंदौर है अव्वल-

- गीले कचरे से इंदौर खाद के साथ ही नेचुरल गैस भी बना रहा: स्वच्छ सर्वेक्षण 2021 में पहले पायदान पर आए इंदौर से जबलपुर को भी सबक लेने की जरूरत है। दरअसल इंदौर में गीले कचरे से न सिर्फ कंपोस्ट (जैविक खाद) बनाई जा रही है बल्कि गीले कचरे से सीएनजी (काम्पैक्ट नेचुरल गैस) भी बनाई जाती है। इसका प्रयोग सिटी बसों में ईंधन के रूप में होता है। खाद किसानों व नागरिकों को बेची जाती है।

जबलपुर में आमदनी अठनी, खर्चा रुपया: जबकि जबलपुर में दो-दो कंपोस्ट प्लांट लगाने के बावजूद उसका उपयोग खाद बनाने के लिए नहीं किया जा सका। इस कारण स्वच्छ सर्वेक्षण के मानकों में शहर खरा नहीं उतर पाया। दरअसल शहर में गीले कचरे का संग्रहण और उसका निस्तारण ठीक ढंग से नहीं हो रहा। प्लांट के रखरखाव में नगर निगम हर माह लाखों रुपये खर्च करता रहा लेकिन फायदा रत्ती भर भी नहीं हुआ।

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नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी से सीधी बात-

सवाल - सूखे और गीले कचरे के संग्रह और उसके निष्पादन में इंदौर हमसे बेहतर है कहां कमी है?

जवाब- सूखे और गीले कचरे के संग्रहण और उसके निष्पादन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कचरा गाडि़यों में अलग-अलग तरह के कचरों का संग्रहण करने पार्टीशन किए गए हैं। कर्मचारियों को अलग-अलग कचरा संग्रहित करने के संबंध में जरूरी निर्देश दिए जाएंगे।

सवाल- गीले कचरे खासतौर से सड़ी-गली सब्जियों से खाद बनाने का प्लांट बंद है। इंदौर में इस तरह के कचरे से खाद और गैस बनाई जा रही है।

जबाव - कचरे की कमी व अन्य कारणों से बलदेवबाग वाला प्लांट बंद रहा। लेकिन कठौंदा स्थित प्लांट चालू था। अब नगर निगम द्वारा स्वयं जल्द ही दोनों प्लांट का संचालन कर पूरी क्षमता से जैविक खाद बनाएगा और नागरिकों को बेचेगा भी।

सवाल- स्वच्छत सर्वेक्षण 2021 में जनता का सहयोग भी जरूरी है। लेकिन जनता का फीड बैक अपेक्षाकृत नहीं था।

जबाव- निश्चित तौर पर शहर को साफ-सुधरा रखने में जनता का सहयोग जरूरी है। जनता के बीच सफाई को लेकर जो छवि बनी है उसमें सुधार लाने के साथ ही जनमानस में सफाई व्यवस्था में सहयोग लेने की दिशा में प्रयास किए जाएंगे।

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मैं हूं स्वच्छता प्रहरी: शहर को स्वच्छ बनाए रखने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम अपने घरों के आस-पास सफाई रखे। अपने वार्ड की सफाई पर ध्यान दें। इधर-उधर कचरा फेंकने वालों को टोंके। न खुद कचरा फेंके न दूसरों को फेंकने दें। सभी में स्वच्छता की आदत होनी चाहिए।

ब्रिजेश शर्मा, सेठ गोविंद दास वार्ड

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क्या कहते हैं नागरिक:

नगर निगम ने कूड़ादान तो तुड़वा दिए लेकिन अब भी शहर में कई जगह सफाई कर्मी खुद कचरा डंप कर रहे हैं। उस कचरे को उसी दिन उठाने की बजाए दो दिन बाद उठवाते हैं। इस तरह की लापरवाही शहर की गलत तस्वीर पेश करती है।

मनीष ताम्रकार, नागरिक

Posted By: Ravindra Suhane

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