रामकृष्ण परमहंस पांडेय ,जबलपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि।संक्रामक बीमारियों में मौत की सबसे बड़ी वजह टीबी और लाइलाज एचआइवी के सह संक्रमण का दायरा बढ़ता जा रहा है। जिले में एक साथ दोनों बीमारियों की चपेट में 17 मरीज आ चुके हैं। इनमें ज्यादातर ऐसे युवा हैं जो समूह में बैठकर नशे के लिए नसों में इंजेक्शन लगाते थे। मरीजों में तीन महिलाएं भी शामिल हैं। चिकित्सकों का कहना है कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण एचआइवी मरीजों को टीबी होने की 70 प्रतिशत ज्यादा संभावना रहती है। जबकि एक आम इंसान को जीवन में कभी न कभी टीबी होने की 30 प्रतिशत संभावना रहती है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कालेज अस्पताल में संचालित एआरटी सेंटर प्रभारी डा. नमिता पाराशर ने बताया कि टीबी मरीज के शरीर में लिम्फोसाइट्स यानि सफेद रक्त कोशिकाओं की मात्रा बढ़ जाती है। ये कोशिकाएं शरीर में प्रवेश करने वाले टीबी के कीटाणु समेत अन्य वायरस से लड़ने में मदद करती हैं। परंतु एचआइवी संक्रमण इन कोशिकाओं को नष्ट कर देता है, जिससे टीबी के प्रति शरीर की रोग प्रतिराेधक क्षमता घट जाती है।

इंजेक्शन से नशा करने वाले सर्वाधिक नशेड़ी जबलपुर में-

राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण समिति के अनुसार इंजेक्शन से नशा करने वाले प्रदेश के सर्वाधिक नशेड़ी जबलपुर में हैं। इस लिहाज से जिले में एचआइवी संक्रमण का खतरा प्रदेश के अन्य जिलों की तुलना में ज्यादा है। डा. पाराशर ने कहा कि इंजेक्शन से नशा करने से टीबी व एचआइवी दोनों बीमारियों का खतरा बना रहता है। एआरटी केंद्र में तमाम ऐसे मरीज दर्ज हैं जो नशे के लिए नसों में इंजेक्शन लगाते थे। ऐसे लोग समूह में बैठकर एक ही सीरिंज से इंजेक्शन लगाते हैं जिससे एचआइवी का खतरा बढ़ता है। नशे के कारण शरीर की रोग प्रतिराेधक क्षमता घट जाती है जिसके चलते ऐसे लोग आसानी से टीबी की चपेट में आ जाते हैं। टीबी व एचआइवी सह संक्रमण का खतरा भी ऐसे लोगों पर ज्यादा रहता है।

छह से नौ माह टीबी की दवा-

एचआइवी, टीबी संक्रमित मरीजों को एचआइवी व एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) के तहत टीबी की दवाएं दी जाती हैं। डा. पाराशर ने बताया कि ऐसे मरीजों को छह से नौ माह तक टीबी की दवा खिलाई जाती है। जबकि एचआइवी की दवाएं आजीवन चलती हैं। दोनों बीमारियां एक दूसरे के लिए घातक होती हैं। यही वजह है कि इनकी चपेट में आने वाले मरीजों को तरह-तरह की शारीरिक व मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

टीबी के लक्षण-

शरीर में कमजोरी लगना व बीमार महसूस करना, बुखार होना व रात में पसीना आना, खांसी के साथ खून आना, वजन जल्द घटना, छाती में दर्द।

एचआइवी के लक्षण-

बुखार, सिरदर्द, मांस पेशियाें व जोड़ों में दर्द, शरीर पर रेशेष होना, खांसी, रात में पसीना, वजन घटना, मुंह में दर्दनाक छाले, गले में खराश, रात में पसीना आना आदि एचआइवी के लक्षण हैं।

फैक्ट फाइल

-जिले में एचआइवी-टीबी सह संक्रमित मरीजों की संख्या-17 (तीन महिलाएं-शेष पुरुष)

-जिले में वर्ष 2022 में एचआइवी के 317 मरीज मिल चुके हैं।

-जिले में औसत हर तीन दिन में एचआइवी संक्रमित दो नए मरीज सामने आ रहे हैं।

-समय से एचआइवी की दवा न लेने वाले यानि डिफाल्टर मरीजों को टीबी होने का ज्यादा खतरा रहता है।

-एचआइवी मरीज में टीबी का पता चलने पर पहले 15 दिन टीबी की दवाएं खिलाई जाती हैं जिसके बाद टीबी-एचआइवी का एक साथ उपचार किया जाता है

Posted By: Rajnish Bajpai

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