जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। घरों से कचरा उठ रहा है या नहीं इसकी हाईटेक निगरानी करने के लिए स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत वर्ष 2017 मेें करीब दो लाख घरों की दीवारों पर आरएफआइडी (रेडियो फ्रिक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन) ठोक दी गई। ये दावा किया गया कि चिप को स्मार्ट सिटी के कंट्रोल एंड कमांड सेंटर से जोड़ा जाएगा। जिससे ये सुनिश्चत किया जाएगा कि घरों से रोजाना कचरा उठ रहा है या नहीं। इससे डोर टू डाेर कचरा कलेक्शन की व्यवस्था में सुधार आएगा और शहर स्वच्छ सर्वेक्षण में पहला मुकाम हासिल करेगा। लेकिन कचरा की निगरानी करने वाली चिप एक वर्ष के भीतर ही खुद कचरे में तब्दील हो गई। बीते पांच वर्षों में न तो चिप कमांड एंड कंट्रोल सेंटर से जुड़ पाई न ही चिप के माध्यम से कचरे की हाइटेक निगरानी हो पाई। पिछले पांच वर्षों में स्वच्छ सर्वेक्षण में शहर पहले पायदान में आना तो दूर टाप -10 में भी नहीं आ पाया।

अधिकारियों ने भी नहीं ली दिलचस्पी : नगर निगम और स्मार्ट सिटी द्वारा डोर टू डोर कचरा कलेक्शन को प्रभावी बनाने की तरफ भी ध्यान ही नहीं दिया। डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन का काम देख रही एस्सल कंपनी अपने सफाई कर्मचारियों को घरों में लगी चिप को स्कैन करने डिवाइस भी नहीं दिए। शुरुआत दौर में जरूर प्रायोगिक तौर सफाई कर्मचारियों को स्केनिंग के लिए डिवाइस उपलब्ध कराए थे। जिससे करीब 500 चिप स्केन करने का दावा किया जाता रहा। लेकिन बाद में न तो कर्मचारियों ने चिप को स्केन करने की जहमत उठाई न ही कंपनी न और न ही निगम निगम के अधिकारियों ने इस तरफ ध्यान दिया।

छह करोड़ 80 लाख रुपये हो गए बर्बाद : स्मार्ट सिटी और नगर निगम के जिम्मेदारों ने शहर को लूटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। कचरे के नाम पर सरकार के खजाने में जमा जनता के पैसे की सफाई करते रहे। दरअसल शहर के करीब 2 लाख 26 हजार घरों की दीवारों में आरएफआइडी चिप लगाने में करीब छ करोड़ 80 लाख रुपये खर्च किए थे, पर नगर निगम और स्मार्ट सिटी की इच्छाशक्ति और ढीले रवैये के कारण करोड़ों रुपये खर्च कर लगाई गई चिप, कंट्रोल एंड कमांड सेंटर से जुड़ने के पहले ही या तो उखाड़ दी गईं या खुद उखड़ कर कचरे में मिल गईं। करोड़ों रुपये भी बर्बाद हो गए।

यदि चिप काम करती तो इंदौर की तरह जबलपुर भी स्व्च्छता में होता अव्व्ल :

- घरों के बाहर दीवारों पर नीले कलर की छोटी सी आरएफआइडी चिप लगाई गई थी ताकि कचरा उठने की जानकारी मिलती रहे।

- कचरा उठाने वाले जैसे ही चिप को स्केनिंग डिवाइस से टच करते वैसे ही कमांड सेंटर में यह मैसेज पहुंच जाता कि आपके घर का कचरा उठा लिया गया है।

- चिप से मिली रीडिंग या यूं कहे रिपोर्ट के आधार पर नगर निगम और स्मार्ट सिटी चिन्हित करती कि किस घर से कचरा उठा रहा और किस घर से नहीं? रिपोर्ट के आधार पर डोर टू डोर कचरा कलेक्शन की व्यवस्था में सुधार किया जाता और कचरा न उठने पर संबंधितों पर कार्रवाई होती।

- इस प्रोजेक्ट से न सिर्फ घरों से कचरा उठाने की व्यवस्था में सुधार आता बल्कि जबलपुर भी इंदौर की तरह स्वच्छता में अव्वल होता।

आज भी मुंह चिढ़ा रही चिप :

- आज भी घरों के बाहर दीवारों पर लगी चिप जिम्मेदारों को मुंह चिढ़ा रही है।

- राइट टाउन क्षेत्र में स्मार्ट सड़क बनाने अधिकांश घरों की दीवारें तुड़वा दी गई।

- लोगों को ये भी कहना है कि जिसे चिप कहा जा रहा उसमें चिप नहीं है सिर्फ प्लास्टिक की पट्टी थी।

- अधिकांश लोगों ने प्लास्टिक पट्टी समझ कर चिप तोड़ दी या जला दीं।

ऐसा था प्रोजेक्ट :

- 2 लाख 76 हजार से ज्यादा संपत्ति दर्ज है निगम के रिकार्ड में

- 2 लाख 70 हजार घरों में चिप लगाने का था लक्ष्य

- 2 लाख 26 हजार घरों में लगाई गई थी आरएफआइडी चिप

- 6 करोड़ 80 लाख रुपये हुए थे खर्च

- 500 चिप ही स्केन हो पाई बाकी हो गई बेकार

स्मार्ट सिटी के प्रशासनिक अधिकारी रवि राव से दो टूक :

सवाल- डोर टू डोर कचरा कलेक्शन की हाइटेक मानीटरिंग करने घरों में रेडियो फ्रिक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन घरों में लगाई गई थी उसका क्या हुआ?

जवाब- घरों में रेडियो फ्रिक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन घरों में लगाई गई थी। लेकिन उसका सही उपयोग नहीं हो पाया प्रोजेक्ट बंद कर दिया गया है।

सवाल- प्रोजेक्ट में करीब सात करोड़ रुपये खर्च किए गए थे फिर उसे अंजाम तक क्यों पहुंचाया गया?

जवाब- चिप के माध्यम से डोर टू डोर कचरा कलेक्शन के तहत चिप को स्केन करने का काम एस्सेल कंपनी को

दिया था लेकिन उसने अपना कार्य ठीक से नहीं किया। यदि चिप स्केन होती तो कंट्रोल सेंटर से मॉनीटरिंग हो पाती।

Posted By: Brajesh Shukla

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