जबलपुर,नईदुनिया प्रतिनिधि। स्कूलों की गुणवत्ता को लेकर सरकार की पहल कागजों में खूब हो रही है लेकिन हकीकत इससे उलट है। शिक्षकों की कमी और स्वच्छता एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। शासकीय शालाओं में जिले के एक लाख 39 हजार विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इन बच्चों की पढ़ाई और साफ-सफाई दोनों को लेकर समस्या बरकरार है। आधा शिक्षण सत्र गुजर चुका है, बच्चों को अब जाकर किताबें हाथ लगी हैं। गणवेश तो अभी तक मिली ही नहीं है।

अब शिक्षक भी नहीं समझ पा रहे हैं कि अक्टूबर में मिली किताबों से कितने तेजी से समय पर कोर्स पूरा कराया जाए। इसके अलावा शौचालय हर स्कूल में बन गए हैं लेकिन वहां पानी नहीं पहुंच सका है। नतीजा शौचालय महज शोपीस बनकर खड़े हैं। जब अफसर निरीक्षण करने पहुंचे तो उन्हें खूबसूरत शौचालय की झलक दिखाकर खुश कर दिया जाए।

साफ-सफाई का बजट ही नहीं

शासकीय प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं के लिए पालक शिक्षक संघ के लिए पृथक बजट आवंटित किया जाता था। जिसके माध्यम से स्कूलों में छोटे-छोटे कार्य करवाए जाते थे। पिछले डेढ़ साल से इसे बंद कर व्यवस्था बदल दी गई है। इसमें शिक्षक को कार्य करवाने से पहले बिल लेकर उसकी विभागीय स्वीकृति लेनी होती है, उसके पश्चात संबंधित कार्य करने वाले के खाते में राशि पहुंचती है। प्रक्रिया जटिल होने की वजह से छोटे कार्य करना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में कई शिक्षक तो अपनी जेब से जरूरी कार्य करवा लेते हैं लेकिन कई इसे नजरअंदाज करते हैं। नतीजा स्कूलों का कार्य प्रभावित होता है। इसमें साफ-सफाई भी एक बड़ी समस्या है। शहरी स्कूलों में तो सफाई कर्मी की व्यवस्था हो जाती लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में सफाई का कोई इंतजाम नहीं है। शौचालय बने हैं ताकि बच्चों खुले में शौच न करें। फिर भी बच्चे खुले में ही शौच करने जाते हैं या फिर घर जाकर शौच करते हैं। इसका कारण भी सफाई ही है। स्कूल में बने शौचालय में पानी का इंतजाम नहीं है। कुछ जगह टंकी रखवाई हैं लेकिन वहां भी पानी बाल्टी या डिब्बे में लेकर जाना पड़ता है। कुंडम क्षेत्र में पानी की समस्या के कारण कई स्कूलों में पानी ही नहीं है। ऐसे में शिक्षक शौचालयों को कम उपयोग करते हैं। ज्यादातर समय शौचालय बंद रखे जाते हैं ताकि जब कोई सरकारी अफसर जांच करने पहुंचे तो उन्हें साफ शौचालय दिखाकर खुश कर दिया जाए।

राज्य शिक्षक संघ के जिला अध्यक्ष नरेंद्र त्रिपाठी ने बताया कि औसत एक स्कूल में 200-300 विद्यार्थी होते हैं जहां शौचालय का इस्तेमाल दिनभर में 500 बार होना स्वाभाविक है। ऐसे में उसकी प्रतिदिन सफाई होना चाहिए लेकिन सफाई कर्मी के लिए न कोई बजट होता न व्यवस्था। ऐसे में शौचालय साफ-सुधरे नहीं रह पाते। जिला परियोजना समन्वयक डीपी चतुर्वेदी ने कहा जिले के सभी स्कूलों में शौचालय बन चुके हैं। साफ-सफाई की व्यवस्था को लेकर उन्होंने माना कि ग्रामीण इलाकों के कुछ स्कूलों में सफाई व्यवस्था को लेकर समस्या है। लेकिन पंचायतों के माध्यम से यह व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। चतुर्वेदी के मुताबिक जल्द ही जल जीवन मिशन के तहत स्कूलों के रनिंग वाटर सप्लाई प्रदान की जाएगी जिसके बाद शौचालयों में पानी की परेशानी से मुक्ति मिलेगी। योजना कम पूरी होगी इसको लेकर फिलहाल विभाग आश्वस्त नहीं है।

शिक्षकों की कमी- शालाओं में विषयवार शिक्षकों के पद रिक्त बने हुए हैं। खासतौर पर संस्कृत और विज्ञान, अंग्रेजी विषय के शिक्षकों के पद बड़ी संख्या में रिक्त हैं। आनलाइन पोर्टल पर रिक्त पदों की सही जानकारी नहीं दर्ज होने की वजह से इन विषयों के अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति पद के विरूद्व नहीं हो पा रही है। इसके अलावा जुलाई से सत्र प्रारंभ हुआ है लेकिन किताबें स्कूलों में हाल में बांटी गई हैं। शिक्षकों को समझ नहीं आ रहा है कि आधा सत्र अब बीतने को आया है ऐसे में कोर्स समय पर कैसे पूरा कराया जाए।

एक्सपर्ट व्यू-

शिक्षकों की इच्छा शक्ति की कमी

फंड की कमी के कारण शिक्षक काम नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा शिक्षकों और संस्था प्रमुख के बीच समन्वय नहीं है। बेहतरी प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों को आउट आफ वे जाकर पदोन्नात करना चाहिए, ताकि दूसरे भी प्रोत्साहित हो सके। विभाग की तरफ से आनलाइन पैसा आता है लेकिन समय पर पैसा नहीं मिल रहा है या उसका समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है जिस वजह से इसका लाभ बच्चों को नहीं मिल रहा है। शाला का पैसा खर्च करने में इतने कागजी मंजूरी होती है जिसमें भ्रष्टाचार के भय से कई शिक्षक कार्य करवाने से कतराते हैं। विभाग को शाला प्रभारियों पर भरोसा कर उन्हें फ्री हैंड देना होगा ताकि संस्था के लिए बेहतर कार्य हो सके।

आरएस दीक्षित, सेवानिवृत्त, प्राचार्य शासकीय उत्कृष्ट उमावि कुंडम

Posted By: Jitendra Richhariya

NaiDunia Local
NaiDunia Local
  • Font Size
  • Close