जबलपुर, नईदुनिया प्रतिनिधि। रेबीज एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज नहीं है सिर्फ बचाव ही एक मात्र उपाय है। इससे बचाव के लिए आवश्यक है कि रेबीज क्या है और कैसे होता है इस बारे में सही जानकारी होना। खास बात यह है कि बीते कुछ सालों मेें शहर में श्वान पालने वालों की संख्या काफी बढ़ी है लेकिन जिस तेजी से रेबीज के प्रति जागरूकता बढ़ना चाहिए वह नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार शहर के जो लोग श्वान पालते हैं उनमें से भी सिर्फ 40 प्रतिशत ही ऐसे हैं जो श्वानों में रेबीज का टीकाकरण करवाते हैं और रेबीज के बारे में जागरूक हैं शेष के बीच इसकी जागरूकता नहीं है। विश्व रेबीज दिवस का आयोजन लोगों को रेबीज के बारे में जागरूक करने के लिए हर वर्ष 28 सितंबर को किया जाता है। इस वर्ष रेबीज- फैक्ट नाट फियर थीम के आधार पर लोगों के बीच जागरूकता लाने का प्रयास किया जा रहा है।

विषाणु जनित रोग है रेबीज: रेबीज एक विषाणु जनित रोग है। जो संक्रमित पशुओं से इंसानों में फैलता है। कभी-कभी ये जानलेवा भी हो सकता है। विशेषकर श्वान, बिल्ली, बंदर के काटने से यह रोग होता है। रेबीज के विषाणु संक्रमित पशु की लार के जरिए इंसान के शरीर में जाते हैं। नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के पशु चिकित्सालय की समन्वयक व विशेषज्ञ डा. अपरा शाही ने बताया कि कई बार लोग यह सवाल पूछते हैं कि श्वान के पंजा लगा है क्या रेबीज हो सकता है। सिर्फ पंजा लगने और खून निकलने से रेबीज नहीं होता जब तक दांत से न काटा गया हो। यदि संक्रमित श्वान या अन्य पशु गाय, बकरी को काट लेता है और वो संक्रमित हो जाती हैं इसके बाद यदि संक्रमित गाय व बकरी की लार के संपर्क में इसान आता है तब भी रेबीज होने की संभावना होती है। रेबीज होने का सबसे बड़ा कारण आवारा श्वान होते हैं। जिनका किसी भी तरह का टीकाकरण नहीं होता और इनमें रेबीज के विषाणु सुप्तावस्था में बने होते हैं। जिनके लक्षण बाद काफी बाद में परिलक्षित होते हैं। जो लोग उच्च नस्ल के श्वान पालते हैं उनमें श्वान को एंटी रेबीज का टीकाकरण कराने की जागरूकता ज्यादा देखने में आती है। श्वान के जन्म के तीन माह के बाद ही उसे एंटी रेबीज का टीका लगवा देना चाहिए।

जिस दिन पशु काटे उसी दिन लगवाएं टीका: विशेषज्ञ डा. शाही ने बताया कि लोगों को इस बात की जानकारी भी नहीं होती कि पशु के काटने के कितने समय बाद एंटी रेबीज का टीका लगवाना चाहिए। हम लोग पशु चिकित्सालय में आने वाले लोगों को बताते हैं कि जिस दिन पशु काटे उसी दिन टीका लगवाना सबसे सुरक्षित है। जिसे जीरो आवर में टीकाकरण कहा जाता है। जैसे-जैसे देर होती है खतरा बढ़ता जाता है। कोशिश करना चाहिए कि 12 घंटे के अंदर टीकाकरण हो जाए। टीके की पूरी डोज लेना भी आवश्यक है। अधूरा टीकाकरण असरकारक नहीं होता। अक्सर लोग श्वान के काटने पर हल्दी वगैरह लगा लेते हैं। ऐसा न करके पहले तो तुरंत टीका लगवान जाएं और इस बीच में कास्टिक सोडा युक्त साबुन से उस स्थान को साफ कर लें। कास्टिक सोडा से रेबीज के विषाणु से बचाव की संभावना होती है अन्य किसी चीज से नहीं।

Posted By: Ravindra Suhane

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