लोकेंद्रसिंह परिहार * पेटलावद (नईदुनिया न्यूज)। कोरोना की तीसरी लहर से निपटने के लिए भले ही स्वास्थ्य विभाग ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है, लेकिन जब इसका रियलिटी चेक किया गया तो पेटलावद के सिविल हॉस्पिटल सहित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों व उपस्वास्थ्य केंद्रो में स्थिति यह है कि वहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है। ग्रामीण क्षैत्रों की बात की जाए तो कई जगह डॉक्टर जाते ही नहीं हैं और कई उपस्वास्थ्य केंद्र बंद पड़े हैं। ऐसे में यदि कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर आती है तो गंभीर मरीजों के इलाज में मुश्किल हो सकती है।

गौरतलब है कि करीब तीन लाख की आबादी को अपनी सेवाएं दे रहा पेटलावद सिविल अस्पताल इन दिनों विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है। स्टाफ की कमी होने के दो मुख्य कारण हैं। पहला ये कि अस्पताल में जितने स्वीकृत पद हैं उनमें से कई पद खाली पड़े हुए हैं और दूसरा ये कि कोरोना के चलते स्टाफ की ड्यूटी फील्ड में लगी हुई है। इस कारण अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले मरीजों को परेशानियां उठानी पड़ रही हैं। यही वजह है कि क्षेत्र की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी अपना उपचार कराने के लिए निजी चिकित्सालयों का रुख करना पड़ता है। सरकारी अस्पताल तो नाममात्र के रह गए हैं। इस ओर न तो कोई अधिकारी, न नेता, न जनप्रतिनिधि ध्यान दे रहे हैं। सुविधाओं के अभाव के साथ मानव संसाधन की कमी भी एक बड़ी समस्या हैं। करड़ावद, रूपगढ़ आदि प्राथमिक और उपस्वास्थ्य केंद्र बरसों से डॉक्टर के इंतजार में है।

डॉक्टरों की कमी, कैसे होगा बेहतर इलाज

-21 विशेषज्ञ डाक्टरों की होना थी नियुक्ति

-8 डॉक्टरों के भरोसे चल रहा सिविल हॉस्पिटल

-89 का संपूर्ण स्टाफ होना था, लेकिन नहीं हुआ

-76 उप स्वास्थ्य केंद्र

-7 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र

-240 राजस्व ग्राम

-78 ग्राम पंचायतें

-करीब 3 लाख आबादी पेटलावद विकासखंड की

-जिले की सबसे अधिक आबादी वाला क्षेत्र है पेटलावद

इतनी बड़ी आबादी और डॉक्टर केवल आठ

अस्पताल के ओपीडी में रोजाना नए और पुराने करीब 200 मरीजों का प्राथमिक इलाज किया जाता है जो कोरोनाकाल दौरान घट गया था, लेकिन एक बार फिर से मरीजों का आवागमन अस्पताल में शुरू हो गया है। आपातकाल और वार्ड में करीब 100 मरीजों का इलाज किया जाता है। इन सभी मरीजों की देखरेख की जिम्मेदारी मात्र आठ डॉक्टरों पर है, जिसमें सामान्य रोग विशेषज्ञ को रोजाना 50 अधिक मरीजों की जांच करनी पड़ती है। वर्तमान में मात्र आठ चिकित्सक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ हैं। इनमें डॉ एमएल चौपड़ा मेडिकल स्पेशलिस्ट जो कि बीएमओ जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इस नाते उन्हें प्रशासनिक कार्यों के साथ अस्पताल की व्यवस्थाएं देखने में काफी परेशानी आ रही है। इन सात डॉक्टरों में एक शिशु रोग विशेषज्ञ, एक स्त्री रोग विशेषज्ञ, एक सर्जन और चार मेडिकल ऑफिसर है। यहां कुल 16 पद खाली पड़े हैं जिसमें हड्डी रोग विशेषज्ञ, सोनोग्राफी स्पेशलिस्ट आदि के पद रिक्त है। इनमें 50 फीसदी चिकित्सक मैदानी अमले के साथ स्वास्थ्य सेवाओं में लगे रहते हैं जबकि सिविल अस्पताल के लिए स्वीकृत पदों में यहां कुल 21 विशेषज्ञों के साथ ही 89 अन्य स्टाफ की नियुक्ति यहां होना है।

नर्सिंग कॉलेजों के स्टूडेंट कर रहे पूर्ति

यही नहीं पेटलावद सिविल हॉस्पिटल में पिछले दो-तीन वर्षों के हाल देखें तो अगर नर्सिंग होम कॉलेजों के स्टूडेंट अगर हॉस्पिटल में अपनी सेवाएं न दें तो वहां की हालात बद से बदतर हो जाएं। यह तो भला हो उन स्टूडेंटों का, जो मरीजों की देखरेख के अलावा अन्य कार्य रोजाना यहां अपनी सेवाएं देकर बखूबी पूरा कर रहे हैं।

गंभीर स्थिति न बनाए ये कमियां

पेटलावद क्षेत्र के हजारों बच्चों के लिए केवल एक ही शिशु रोग विषेशज्ञ है। वह भी पेटलावद सिविल हॉस्पिटल में पदस्थ है। अन्य स्वास्थ्य व उप स्वास्थ्य केंद्रों पर एक भी शिशु रोग विषेशज्ञ नहीं है। ऐसी स्थिति में बच्चों का इलाज आखिर कैसे हो सकेगा। यह एक बड़ा चिंता का विषय है। आने वाले समय में यही कमियां गंभीर स्थिति को जन्म दे सकती है। शासन-प्रशासन इसे पूरा करने पर जल्द ही विचार करें।

लाखों लोगों को बेहतर स्वास्थ्य का अभी भी इंतजार

पेटलावद क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। यहां पर लगभग 240 राजस्व ग्राम हैं जहां तीन लाख से अधिक लोग निवास करते हैं। यही वजह है कि यह क्षेत्र जिले की सर्वाधिक आबादी वाला विकासखंड है। पेटलावद शहर में एक सिविल हास्पिटल जो हाल ही में शुरू हुआ है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 76 उप स्वास्थ्य केंद्र और 7 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। पेटलावद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर प्रतिदिन 12 से 15 से अधिक प्रसव केस आते हैं। इन लाखों लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का इंतजार अभी भी है।

जो डॉक्टर हैं वे दिन-रात कर रहे एक

हालांकि जो भी डॉक्टर पेटलावद में है, वे कोरोनाकाल से आज तक दिन-रात मरीजों की सेवा में लगे हुए हैं। उनकी इस सेवा के जज्बे को हर कोई सलाम कर रहा है। अपने-अपने स्तर पर मरीजों की देखरेख करना, उन्हें सही उपचार मिल रहा है या नही,ं इसकी जानकारी जुटाना हर वो काम बखूबी पूरा कर रहे हैं। बस कमी है तो कुछ और एक्सपर्ट डॉक्टरों की, जिनकी नियुक्ति यहां होने के बाद इन डॉक्टरों का हौंसला और बढ़ जाएगा।

अनुभवी डॉक्टर को तरस रहा पेटलावद नगर

नगर में अनुभवी डॉक्टर के नाम पर केवल एक ही डॉक्टर है, वे हैं सेवानिवृत्त डॉॅ. एसके महाजन। इनके साथ एक ओर डॉक्टर थे, जिनका पूरे पेटलावद क्षेत्र से गहरा नाता रहा है। वे थे डॉ. केडी मंडलोई। बीते कोरोना काल में उनका निधन हो गया था। हालांकि सिविल हॉस्पिटल से उनकी सेवानिवृत्ति पहले ही हो चुकी थी, लेकिन उनके बाद एक भी अनुभवी डॉक्टर पेटलावद को नहीं मिला है। जिन डॉक्टरों की यहां नियुक्ति हुई है, उनमें अनुभव की कमी साफ झलकती है। अनुभवी डॉक्टरों के अभाव में लोगों को इंदौर, रतलाम जैसे बड़े शहरों में अपना उपचार करना पड़ रहा है।

आए दिन लैबोरेटरी रहती है बंद

पेटलावद सिविल हॉस्पिटल की लैबोरेटरी आए दिन बंद रहती है। शुक्रवार को भी जब नईदुनिया टीम सिविल हॉस्पिटल पहुंची थी तो लैबोरेटरी बंद थी। यहां केवल मलेरिया की जांच हो सकती है। डेंगू, चिकनगुनिया आदि बीमारियों की जांच के लिए अभी तक कोई व्यवस्था नहीं हो पाई है।

वैकल्पिक इंतजाम जरूरी

पेटलावद में अब सबसे ज्यादा किसी संसाधन की कमी खल रही है तो वह है सीटी स्कैन मशीन। सीटी स्कैन की सुविधा केवल जिले में है। ऐसे में तीसरी लहर आने पर संभावित रोगियों की जांच में परेशानी आएगी। सूत्र बताते हैं कि अभी पेटलावद में मशीन की व्यवस्था होने की आस नहीं है। ऐसे में वैकल्पिक इंतजाम करना जरूरी होगा। जो ऑक्सीजन प्लांट लगा है वह भी पेटलावद के जनसहयोग से अस्पताल में लगाया गया है।

शासन से मांग की है

पेटलावद बीएमओ डॉ. एमएल चौपड़ा ने बताया कि अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित नहीं हो रही हैं। यह सही है कि चिकित्सक समेत अन्य स्टाफ की कमी है। इसके लिए शासन स्तर पर मांग रखी जा चुकी है। जो निर्णय होना है वरिष्ठ स्तर पर ही होगा।

Posted By: Nai Dunia News Network

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