थांदला(नईदुनिया न्यूज)। आचार्य श्री उमेशमुनि जी के सुशिष्य प्रवर्तक जिनेन्द्रमुनि जी की आज्ञानुवर्तिनी साध्वी निखिलशीला जी चातुर्मास हेतु स्थानीय पौषध भवन स्थानक पर विराजित हैं। उनके सानिध्य में जप-तप-त्याग सहित कई विभिन्ना धार्मिक गतिविधियां गतिमान हैं। इसी क्रम में मालव केसरी गुरुदेव श्री सौभाग्यमल जी का 37वां पुण्य स्मृति दिवस तप-त्याग से उत्साहपूर्वक श्रीसंघ द्वारा मनाया गया।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी निखिलशीला जी ने फरमाया कि भगवान महावीर देव इस अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर हुए। आपके शासन में कई आचार्य हुए तो कई विशिष्ट धर्म प्रभावक भी हुए तो कई विशिष्ट श्रावक-श्राविकाएं भी हुए। भगवान चारों ही तीर्थ की प्रभावना करने वाले होते हैं। जो विशेष गुणों से युक्त आत्मा होते हैं उनके गुणों का गुणानुवाद किया जाता है। व्यक्ति जन्म से नहीं, अपने कर्म से पहचाना जाता है। जन्मतिथि बीज के समान है और पुण्यतिथि वृक्ष के समान। पुण्यतिथि में उस पुण्यात्मा का सारा जीवन हमारे सामने आ जाता है। पुण्यतिथि पर हम विशेष तप-आराधना करते हैं या धर्म-आराधना करने की प्रेरणा देते हैं। उन महापुरुषों के सद्गुणों को ग्रहण करने का लक्ष्‌य भी होना चाहिए। ऐसे ही महापुरुष का जन्म मालवा की धरती नीमच के छोटे से सरवानिया ग्राम में माता केशरदेवी की कुक्षी से हुआ। जन्म के समय कौन जानता था कि ये इतने बड़े धर्म प्रभावक होंगे।पिता चौथमलजी तथा माता केशरदेवी ने एक कोहिनूर रूपी हीरे को जन्म दिया था।

आपके जन्म के समय आपके पिताजी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। आपका बचपन बहुत ही संघर्षमय रहा, छोटी सी उम्र में माता-पिता का वियोग हो गया। एक व्यक्ति आपको बहाल-फुसलाकर खाचरोद ग्राम तक ले आया और उसने भी उन्हें वहां छोड़ दिया। छोटा बालक चौराहे पर खड़ा इधर-उधर देख रहा है तभी एक श्रेष्ठी मियाचंदजी की नजर बालक पर पड़ी। उन्होंने बालक से पूछा तुम्हारा नाम क्या है तब बालक ने धीरे से कहा- सौभाग्य और साथ में कहा- मुझे भूख भी लगी है। तब मियाचंदजी बालक को घर ले आए तथा उसका पालन-पोषण पुत्रवत करने लगे। वहीं साधु-संतों का समागम प्राप्त कर आपने 10 वर्ष की छोटी-सी उम्र में संयम ग्रहण किया।

समस्त जीवों के प्रति मैत्री भाव रखना ही जिनधर्म का मूल

धर्मसभा में साध्वी प्रियशीला जी ने फरमाया कि सामान्य श्रावक के 15 नियमों में जिनधर्म में रुचि होना भी एक नियम है। सभी धर्म अपने को श्रेष्ठ बताते हैं किन्तु सही-गलत की पहचान हमें अपनी बुद्धि से करनी होती है। अपनी आत्मा से प्रतिकूल आचरण दूसरों के लिए नही करना चाहिए। आपने मालव केसरीजी के विषय मे फरमाया कि आप बचपन में अनाथ हो गए थे लेकिन बाद में निर्ग्रन्थ प्रवचन की शरण ग्रहण कर कइयों के नाथ हो गए।

चल रहा तपस्याओं का दौर

श्रीसंघ सचिव प्रदीप गादिया तथा नवयुवक मंडल सचिव जितेंद्र सी. घोड़ावत ने बताया कि धर्मसभा में साध्वी निखिलशीला जी के सानिन्नध्य में गौरव सुजानमल शाहजी ने 11 उपवास की तपस्या पूर्ण की। श्रेया कांकरिया तथा दीपा शाहजी धर्मचक्र की तपस्या कर रही है। तेले की लड़ी में आज श्रेया कांकरिया तथा आयंबिल की लड़ी में सपना रुनवाल का क्रम था। साथ ही सामूहिक एकासन तप के 130 से अधिक आराधकों ने प्रत्याख्यान ग्रहण किए जिनके सामूहिक एकासन महावीर भवन पर हुए। संघ में कई श्रावक श्राविकाएं गुप्त तपस्या भी कर रहे हैं। धर्मलता जैन महिला मंडल की अध्यक्ष शकुंतला कांकरिया ने बताया कि चातुर्मास प्रारंभ से ही महिला मंडल की सदस्याएं नवकार मंत्र के सामूहिक जाप प्रतिदिन कर रही है। सामूहिक एकासन करवाने का लाभ श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ थांदला ने लिया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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