निभर्यसिंह ठाकुर, पिटोल (झाबुआ)। एकलव्य ने जिस तरह द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या में निपुणता हासिल की थी, ठीक उसी तरह एक संत के कहने पर सामान्य आदिवासी परिवार में जन्मे बालक ने जंगल में पत्थर को हनुमानजी की मूर्ति के रूप में स्थापित कर आराधना की। विद्या अध्ययन कर शिक्षक बना। कई विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षा का अलख जगाया। सेवानिवृत्ति के बाद अब वे समाज के हित में काम कर रहे हैं। जरूरतमंद विद्यार्थियों को मदद करना अब भी वे नहीं भूलते। यहां जिक्र हो रहा है समीपस्थ गांव पांच का नाका के सुखलाल खराड़ी का। 70 की उम्र में भी सुखलाल अपने नाम को चरितार्थ कर लोगों में खुशियां बांट रहे हैं। जोश और जज्बा जरा भी कम नहीं हुआ है। सालों पहले जिस पत्थर को हनुमानजी की मूर्ति मान उन्होंने जीने का लक्ष्य हासिल किया, वहां सेवानिवृत्ति के बाद स्वयं के रुपए से मंदिर का निर्माण वे करवा चुके हैं। जरूरतमंद विद्यार्थियों को पाठ्य पुस्तकें और गणवेश बांटना उनका शौक है।

इस काम के लिए पूर्व में वे अपने वेतन से खर्च करते थे, अब पेंशन का अधिकांश भाग इसी काम में खर्च करते हैं। बारिश में जंगलों से कई किमी दूर पैदल स्कूल जाने वाले विद्यार्थियों को वे हर साल छाते बांटना भी वे नहीं भूलते। इन दिनों आदिवासी समाज के लोगों में सद्प्रवृत्ति जागृत करने के लिए मांस, मदिरा से दूर रहकर प्रकृति से प्रेम करने और जंगल नहीं काटने जैसे संदेश दे रहे हैं।

बच्चों को भी पढ़ाया

आदिवासी भील समाज के सुखलाल खराड़ी पढ़ाई पूरी करने के बाद प्राथमिक विद्यालय में ही शिक्षक नियुक्त हो गए थे। अशिक्षा के अंधेरे के दूर करने के अपने उद्देश्य के चलते उनके दोनों बेटों ने भी पढ़ाई पूरी की। एक बेटा शिक्षक बन उन्हीं के काम को आगे बढ़ा रहा है। दूसरा परिवार की खेती की देखभाल करता है। घर से एक किमी दूर पांच का नाका के जंगल में पूजा-पाठ के साथ ध्यान-योग करना अब उनका नित्यकर्म हो गया है।

समाज की दुख-तकलीफ को नजदीक से जाना

सुखलाल मानते हैं कि जिस स्थान पर देव स्थापना होती है,वह स्थान पवित्र और आस्था का केन्द्र बन जाता है, इसीलिए वे देवस्थल के आसपास के पेड़-पौधों की रक्षा करते हैं और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए लोगों को भी प्रेरित करते हैं।

सुखलाल बताते हैं कि आदिवासी भील समाज के होने से समाज की दुख-तकलीफ को उन्होंने करीब से देखा-जाना है, इसलिए वे समाज हित में ऐसे काम करना चाहते हैं, जिससे नई पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त हो सके। खराड़ी कहते हैं कि सरपंच, तड़वी से आग्रह करेंगे कि आर्थिक रूप से पिछड़े समाज से दहेज की बुराई दूर करने में योगदान दें।

Posted By: Sandeep Chourey

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