मयंक बाफना, बामनिया (झाबुआ)। श्रद्धा और भक्ति का परंपरागत अनूठा उदाहरण जिले के करवड़ में देखने को मिला। जहां बड़ी संख्‍या में लोग धधकते अंगारों पर से होकर गुजरे।

उल्‍लेखनीय है कि पिछले 100 वर्षों से माताजी के मंदिर के बाहर 18 फीट लंबी चूल पर सैकड़ों लोग होलिका दहन के अगले दिन अंगारों पर चलते हैं।

श्रद्धालुओं का कहना है कि कई वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है। ये लोग अंगारों पर श्रद्धा के साथ चलते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद चूल पर चलते हैं। पैरों में किसी भी प्रकार की कोई नुकसान या तकलीफ नहीं होती है।

पूरे क्षेत्र में इस वर्ष भी लगभग सैकड़ो पुरुष, महिलाएं व बच्चे चूल पर चले। ग्राम करवड़ में मेले जैसा माहौल रहा। चूल देखने के लिए आसपास के हजारों ग्रामीण करवड़ पंहुचे। सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस व प्रशासन दल-बल के साथ मुस्तैद रहा।

क्या होती है चूल

माताजी के मंदिर के सामने 18 फीट लंबी और लगभग 2-3 फीट गहरी चूल (नाली) खोदी जाती है। इसमें लकड़ियां व अन्य सामग्री से अंगारे तैयार किए जाते हैं। अंगारों पर कई किलो घी डाला जाता है। अंगारों पर चलने वाले श्रद्धालु गांव के बाहर एकत्र होकर नगर भ्रमण करते हुए चूल के स्थान पर पहुंचते हैं। श्रद्धा के साथ चूल पर चलते हैं।

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