झाबुआ (नईदुनिया प्रतिनिधि)। जो कड़कनाथ क्षेत्र की शान माना जाता था, वही कड़कनाथ अब बैकफुट पर आ चुका है। वजह यह है कि उसमें वायरस फैलने की मंगलवार को एक निजी पोल्ट्री फार्म पर पुष्टि हो गई है। कड़कनाथ से गुलजार रहने वाला यह पोल्ट्री फार्म तो वीरान हो गया है, लेकिन दूसरे पोल्ट्री फार्म के सामने भी अब संकट आ गया है। कड़कनाथ को खरीदने में अब किसी की रुचि नहीं बची। ऐसे में कड़कनाथ पालकों के सामने अब रोजी-रोटी का संकट खड़ा होना तय है। इस मौसम में कड़कनाथ का 30 लाख का मासिक व्यवसाय हो जाता था।

रूंडीपाड़ा के आशीष कड़कनाथ मुर्गा-मुर्गी पालन केंद्र के संचालक विनोद मेडा मेहनत के बल पर इस क्षेत्र में अच्छा मुकाम हासिल करते जा रहे थे। जब क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी ने उन्हें 2 हजार कड़कनाथ चूजे रांची भेजने का ऑर्डर दिया तो वे एकदम चर्चा में आ गए। वे चूजे लेकर झारखंड जाने की तैयारी कर रहे थे। इसी बीच धोनी के दुबई में होने की जानकारी मिली तो रुक गए। बर्ड फ्लू शुरू होते ही 6 जनवरी से उनके केंद्र पर मुसीबत के भंवर मंडराने लगे। एक-एक करके कड़कनाथ चूजे व मुर्गे मरने लगे। एक मुर्गे का सैंपल भोपाल गया तो मंगलवार को उसमें वायरस का प्रकोप निकला। इसके बाद स्थिति यह है कि उनका पूरा केंद्र वीरान हो चुका है। कुल 2850 कड़कनाथ चूजे व मुर्गे-मुर्गियां मर गए हैं या मार दिए गए हैं।

5 लाख का लोन उतर जाता

मेडा का कहना है कि केंद्र की स्थापना के लिए उन्होंने लोन लिया था। 5 लाख के आसपास उन्हें पैसा चुकाना था। उम्मीद थी कि इस सीजन में ही सारा पैसा चुकता करते हुए लोन उतार देंगे। एक वायरस ने उनके सारे अरमानों को ध्वस्त कर दिया है। अब वे राज्य शासन से मदद की गुहार कर रहे हैं।

30 लाख का व्यवसाय

जिले में दो सरकारी केंद्रों के अलावा 58 निजी कड़कनाथ पोल्ट्री फार्म है। इन स्थानों से 30 लाख का व्यवसाय मोटे तौर पर एक माह में इस सीजन में हो जाता है। एक कड़कनाथ 800-1200 रुपये तक आसानी से बिक जाता है। अब स्थिति यह है कि कड़कनाथ के खरीददार ही दहशत के मारे नहीं जाएंगे।

दो माह लग सकते हैं

कृषि विज्ञान केंद्र के जिला परियोजना समन्वयक इंदरसिंह तोमर का कहना है कि कड़कनाथ को इस बीमारी से उभरने में दो माह तक का समय लग सकता है। हालांकि सभी केंद्रों पर अब सुरक्षा बढ़ा दी गई है। केंद्र पर खरीददार भी अब नहीं के बराबर आ रहे हैं। कड़कनाथ मुर्गी पालन के क्षेत्र में आगे आए ग्रामीणों के लिए एक गहरा संकट पैदा हो गया है।

सैनिटाइज करवा रहे

पशु चिकित्सा विभाग के कड़कनाथ पालन केंद्र प्रभारी अमर सिंह दिवाकर का मानना है कि अन्य केंद्र सावधानी रखेंगे तो वे इस वायरस के प्रकोप से बच सकते हैं। लगातार सैनिटाइज करने की जरूरत है। यह बात सही है कि बर्ड फ्लू मिलने के बाद से ही कड़कनाथ की मांग में एकदम गिरावट आ गई है।

कड़कनाथ नस्ल सिर्फ झाबुआ जिले में पाई जाती है। इसलिए इसको जीआई टैग मिला हुआ है। अन्य मुर्गों की तुलना में सारे तत्व इसमें ज्यादा हैं। कोरोना काल में इसे सबसे अधिक मजबूत ह्युमिनिटी बूस्टर माना गया। इसलिए एकदम से इसकी मांग बढ़ी।

Posted By: Nai Dunia News Network

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