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तासीर राजनीति की : 15 आम चुनाव के बाद भी हालात जस के तस, उम्मीदवारी में ही यहां अटक जाता है पेंच

झाबुआ में टिकट के लिए हमेशा ही होते रहे हैं विवाद

झाबुआ। नईदुनिया प्रतिनिधि

15 आम चुनाव अब तक झाबुआ विधानसभा में हो चुके हैं। कुछ ही दिनों में यहां पर पहला उपचुनाव होने जा रहा है। चुनाव व उम्मीदवार की घोषणा हो, इसके पहले ही कांग्रेस में पूर्व विधायक को उम्मीदवार बनाने के खिलाफ बगावत के स्वर उठ गए है। अब यह सिलसिला लगातार चलता रहेगा। वजह यह है के झाबुआ विधानसभा में सबसे मुश्किल पेंच हमेशा से उम्मीदवार चयन का ही रहा है। शुरूआत से ही यहां टिकट को लेकर हमेशा झगडे चलते रहे है।

1952 के पहले चुनाव में मामा बालेश्वर दयाल ने यहां से जमुना देवी को सोशलिस्ट पार्टी का उम्मीदवार बनाया था। दूसरा चुनाव आने से पहले ही यह तय हो गया था कि अब जमुना देवी को अगले विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा। 1957 में ठीक ऐसा ही हुआ। जमुना देवी का टिकट कटा तो कांग्रेस के सुरसिंह भूरिया को चुनाव जीतकर भोपाल जाने का मौका मिल गया। 1962 में फिर राजनीतिक चक्रव्यूह ऐसा घुमा कि पूर्व विधायक भूरिया का भी टिकट काट दिया गया। गंगा बाई को मौका दिया गया तो कांग्रेस की आपसी फूट के कारण वे चुनाव हार गई। 1967 के चुनाव में नए चेहरे बापूसिंह डामोर पर कांग्रेस ने दाव खेल दिया। डामोर जीत गए लेकिन 1972 के चुनाव में फिर उनका टिकट काटने के लिए झाबुआ से लेकर भोपाल तक हल्ला मचा। कांग्रेसी नेताओं ने बस एक ही मांग रखी, डामोर का टिकट काटो। आपसी झगडे का परिणाम यह रहा कि गंगा बाई को फिर से उम्मीदवार बनाना पडा।

फिर गंगा बाई को बदला

1977 के चुनाव में गंगाबाई का टिकट फिर कांग्रेस ने बदल दिया। इस बार बापूसिंह डामोर एक बार फिर उम्मीदवार बने। उस चुनाव में कांगेस विरोधी लहर के बावजूद डामोर चुनाव जीत गए तो फिर उनकी टिकट कटने का खतरा भी कुछ साल के लिए टल गया। 1980, 1985, 1990 व 1993 में डामोर टिकट पाते रहे और विधायक बनते रहे। हालांकि हर बार विकल्प भी प्रस्तुत किए गए।

फिर टिकट काट दिया

डामोर के विरोधियों ने मौका मिलते ही 1998 में उनका टिकट काट दिया। अब नया चेहरा स्वरूप बेन के रूप में सामने आया। 2003 आते-आते उन्हें भी हटाने की मांग होने लगी। टिकट नहीं काटा तो अलमारी चुनाव चिन्ह के साथ कांग्रेसी नेता कांतिलाल बारिया व मानसिंह मेडा ने कांग्रेस की दाल पतली कर दी। कांग्रेस की फूट का लाभ भाजपा को मिल गया। 2008 के विधानसभा चुनाव मे पहले जिला पंचायत अध्यक्ष कलावती भूरिया को उम्मीदवार बनाने का ऐलान हुआ। उनका स्वागत भी हो गया। अंतिम समय पर टिकट बदलते हुए जेवियर मेडा को कांग्रेस ने मैदान में उतार दिया।

2013 में कलावती ने इस अपमान का बदला निकालते हुए जेवियर को चुनाव हरवाया। फिर भाजपा भोपाल पहुंची। 2018 में कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी डॉ. विक्रांत भूरिया को बनाया तो उनके सामने जेवियर मेडा ने ताल ठोक दी। परिणाम भाजपा के पक्ष में चला गया। विधायक के बाद सांसद का चुनाव भी जीतने से गुमानसिंह डामोर ने झाबुआ सीट खाली की। डामोर के इस्तीफे के बाद उपचुनाव का बिगुल बजा हुआ है। अब चुनाव की तिथि घोषित होने वाली है तो कांग्रेस की लडाई उम्मीदवारी को लेकर एक बार फिर सडकों पर आ गई है।