पंन्यास प्रवर जिनेन्द्रविजयजी ने मांगलिक सुनाते हुए प्रेरित किया

झाबुआ। नईदुनिया प्रतिनिधि

ऋषभदेव बावन जिनालय में शुक्रवार को सुबह आचार्य श्रीमद् विजय नरेन्द्र सूरीश्वरजी 'नवल' ने मांगलिक सुनाकर श्वेतांबर जेन श्रीसंघ के वयोवृद्ध संरक्षक दुलीचंद वागरेचा के स्वर्गवास पर कहा कि यह शरीर किराए का घर है। इसलिए मनुष्य को पल-पल धर्म-आचरण करते हुए जीवन को सफल करके परलोक को सुधारना चाहिए। आचार्यश्री ने आगे कहा कि हम सभी को शोक निवारण करके 'मृत्यु निश्चित है' यह स्मरण रखते हुए नश्वर काया, क्षणभंगुर माया को छोड़कर पुण्य कमाई करना चाहिए। तन में व्याधि हो जाना कर्मजन्य है। मन में समाधिस्थ रहना धर्मजन्य सुफल है। ज्ञान जीवन को आनंदमय बनाकर समस्त विषाद समाप्त करता है

पंन्यास प्रवर जिनेन्द्रविजयजी 'जलज' ने नवपद का विवेचन करते हुए बताया कि सातवां पद सम्यक्‌ ज्ञान पद है। ज्ञान जीवन को आनंदमय बनाकर समस्त विषाद को समाप्त कर देता है। पांच ज्ञान के 51 भेद होते हैं, इसलिए भगवान की आरती में पांच दीपक रखे जाते हैं। ज्ञान से दुःख टल जाते हैं। अज्ञान ही समस्त दुखों का मूल है। ज्ञान स्व और पर का कल्याण करने में समर्थ है। अज्ञानी जीवन को नरक बना लेते हैं। ज्ञानी संसार को स्वर्ग बनाकर आनंद से स्वयं जीते हैं तथा दूसरों को भी शांति से जीने देते हैं।

आराधकों ने किए जाप

बावन जिनालय में शुक्रवार सुबह छह बजे सिद्धचक्र के यंत्र पर पंचामृत से अभिषेक किया गया। बाद में केसर पूजन हुई। सिद्धचक्रजी की स्नात्र पूजन पढ़ाई गई। आराधकों द्वारा सातवें दिन भी मंत्रजाप किए गए। इसके बाद सिद्धचक्र की नवपदों की सामूहिक आरती हुई। दोपहर में आयंबिल का सभी आराधकों ने लाभ लिया। शाम को सामूहिक प्रतिक्रमण हुआ।

चारित्रधारी आत्मा का एकमात्र लक्ष्य है मोक्ष को पाना

- नवपद ओलीजी के आठवें दिन चारित्र विषय हुई धर्मसभा

- सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं हुए शामिल

पेटलावद। नईदुनिया न्यूज

साधुु का वेश वंदनीय जब होता है, जब वह ज्ञान व श्रद्धा से युक्त होता है। जो मन-वचन-काया से पाप क्रिया का त्यागी हो जाता है। जो हर क्षण पापों पर प्रहार करने वाला हो। जो भव परंपरा को खत्म करने का पुरुषार्थ करता हो। जो अपने संयम में हर क्षण सावधान रहता है। जो पांच प्रकार से चरित्र का पालन करता है, ऐसा साधु उज्ज्वलता का प्रतीक होता है। वह वंदनीय व आराधना के योग्य होता है।

नवपद ओलीजी के आठवें दिन चारित्र (संयम) का सही स्वरूप समझाते। ये विचार प्रवर्तकश्री जिनेंद्रमुनिजी ने व्यक्त किए। सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं धर्मसभा में शामिल हुए। उन्होंने आगे कहा कि चारित्रधारी आत्मा का एकमात्र लक्ष्य कर्म को क्षय कर मोक्ष को पाना होता है। आपने व्रतो के तीन स्वरूप बताए- प्रत्याख्यान, संवर, प्रतिक्रमण। अभयमुनिजी ने कहा कि महावीर भी कहते हैं, वैज्ञानिक भी कहते हैं- नकारात्मक सोच जीवन में अशांति का कारण बनती है। मन जब भी अशांत हो तो हमें नमस्कार महामंत्र का स्मरण करना चाहिए। अपमान में समभाव रखना ही सच्ची साधना है।