भारत माता को गुलामी की जंजीर से मुक्त करवाने में नौ अगस्त 1942 को हुए भारत छोड़ो आंदोलन की प्रमुख भूमिका मानी जाती है, क्योंकि यह वह आंदोलन था, जिसकी कमान आम जनमानस के हाथों में रही । झाबुआ में भी इस आंदोलन का शिक्षकों व विद्यार्थियों ने शंखनाद करते हुए अंग्रेजशाही व राजाशाही के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। उस समय केरोसीन के लैंप की रोशनी में शहर में जुलूस निकाला गया। फिर दरबार हाई स्कूल पर तिरंगा फहराते हुए संदेश दे दिया गया कि अब पूर्ण स्वराज से कम कुछ भी मंजूर नहीं।

झाबुआ में आज के उत्कृष्ट विद्यालय और राजा शाही के जमाने के दरबार हाई स्कूल में देश भक्ति की आग अंदर ही अंदर उफन रही थी। वजह यह थी कि युवकों की एक शाखा बाबूलाल आजाद जेल बगीचे के समीप हर शाम को संचालित करते हुए भारत माता की महिमा का गुणगान किया करते थे। दरबार हाई स्कूल के शिक्षक नर्मदा प्रसाद भल्ला, एसएन जौहरी व डीपी भल्ला भी वहां पहुंचकर राष्ट्रीय चेतना जगाते रहते थे। आजाद अपने घर पर बच्चों की ट्यूशन लेते थे और धार जिले से आकर झाबुआ के बाजार में किराए का मकान लेकर रहते थे।

रात नौ बजे एकत्रित हुए

80 वर्ष पहले जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन का ऐलान किया तो राष्ट्र भक्त शिक्षकों ने भी योजना बनाते हुए अपने सभी विद्यार्थियों को नौ अगस्त 1942 की रात नौ बजे बोर्डिंग हाउस पर एकत्रित होने का कहा । यहां हमेशा विद्यार्थियों की चहल-पहल रहती है व खेल गतिविधियां होती ही रहती थीं, इसलिए किसी को शंका नहीं हुई।

भूरे बंदर वापस जाओ

भल्ला,आजाद आदि शिक्षकों ने विधार्थिर्यों से कहा कि दो-दो की पंक्ति में चलना है और थांदला गेट तक कुछ शोर नहीं करना है । योजना के अनुसार सभी थांदला गेट से जैसे ही शहर में दाखिल हुए, फिरंगियों भारत छोड़ो, भूरे बंदर वापस जाओ, वंदे मातरम, महात्मा गांधी की जय, भारत माता की जय जैसे नारे लगाते हुए जुलूस निकालने लगे । एक छात्र बांस पर तिरंगा लेकर चलने लगा और बारी-बारी से सभी छात्र तिरंगे को लेकर जुलूस में चलते रहे । छात्रों की संख्या 40 के करीब बताई जाती है जो गलियों में घूमते रहे। सड़को को उस समय नगर पालिका केरोसीन के लेम्प से रोशन करती थी इसलिए किसी की शक्ल भी आसानी से पहचान में नही आ रही थी । पुलिस कर्मी भी एकदम हुए इस प्रदर्शन से हक्का-बक्का रह गए । वे कुछ समझ पाते, इस बीच थांदला गेट आकर जुलूस दरबार हाई स्कूल पहुंच गया जहां शान से तिरंगा लहरा दिया गया। पास के सरकारी आवास में रहने वाले हेडमास्टर शोर सुनकर बाहर निकलते,इसके पहले सभी छात्र बिखर गए । बाद में हेडमास्टर ने तिरंगा उतरवाया ।

यातना से नहीं डरे

जब छात्र वापस अपने घर लौट रहे थे तो पुलिसकर्मियों ने आकर तीन छात्रों को पकड़ लिया। थाने ले जाकर उनकी बेंत से पिटाई की गई । बार-बार पूछा गया कि किसने इस विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई और इसमें शामिल होने वालों के नाम बताओ। यातना सहने के बावजूद गिरफ्तार छात्रों ने अपना मुंह नही खोला। आखिरकार सुबह उन्हें घर भेज दिया गया ।

एक छात्र ने गड़बड़ की

बोर्डिंग हाउस में एक सरकारी कर्मी के पुत्र का आना-जाना रहता था और उसे यह पूरी योजना मालूम पड़ गई थी। उसने अपने पिता को और पिता ने कौंसिल प्रेसिडेंट दिलीपसिंह राठौड़ को जानकारी दे दी । राठौड़ सूचना भिजवाकर स्कूल में आ गए । आंदोलन में शामिल सभी छात्रों के नाम लेते हुए उन्हें खड़े किए गए। माफी मांगने का कहा गया मगर कोई टस से मस नहीं हुआ।

पिस्तौल तान दी

फिर शिक्षकों के बारे में अपमानजनक भाषा का उपयोग होने लगा तो शिक्षक भल्ला ने आपत्ति ली। उन्हें तत्काल पकड़ने के निर्देश हुए तो उन्होंने जेब से पिस्तौल निकालकर तान दी । अन्य दोनों शिक्षक भी आगे आए। इसी बीच नाराज होकर राठौड़ चले गए। कुछ बड़ा होता,इससे पहले तीनों देशभक्त शिक्षक स्कूल से निकलकर भूमिगत हो गए । उधर, आजाद भी मकान खाली करके तत्काल कहीं रवाना हो गए।

करो या मरो के नारे का प्रभाव

इतिहासकार डा. केके त्रिवेदी का कहना है कि गांधी जी ने कहा था कि करो या मरो । इस नारे का अर्थ यह था कि अब खुद के दम पर कुछ कर दिखाओ। इस संदेश ने राष्ट्रीय चेतना जगा दी और आदिवासी अंचल में भी अनुकरणीय कार्य हुआ । तमाम प्रतिबंध के बीच झाबुआ में छात्रों का जुलूस निकलना,तिरंगा फहराना और फिर शिक्षक का पिस्तौल तानते हुए विद्रोह करना असामान्य घटना थी जो यह बता रही थी कि राष्ट्रवाद की भावना अब किसी भी हालत में दब नही सकती।

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