यशवंतसिंह पंवार, झाबुआ।

92 साल पुरानी झाबुआ नगर पालिका में आजादी के बाद से पार्षद ही अध्यक्ष को चुनते रहे हैं। इसके चलते पार्षदों की पूछपरख जोरों पर रही है। इससे लोकतंत्र को भी कई बार खतरा पैदा हुआ है। अब फिर से पार्षदों की भूमिका ही सर्वोपरि होगी, क्योंकि राज्य सरकार ने अप्रत्यक्ष प्रणाली से नगर पालिका व पंचायतों के अध्यक्ष चुनने का फैसला कर लिया है। गौरतलब है कि इस सिस्टम की खामियों के चलते ही प्रत्यक्ष प्रणाली अस्तित्व में आई। झाबुआ नगर पालिका में इसकी शुरुआत 1998 से हुई। संयोग यह है कि यहां की नगर पालिका में अध्यक्ष पद पर भाजपा का खाता भी उसी समय खुला था।

नगर की जनता को सीधे अपना अध्यक्ष चुनने का मौका 1998 में मिला। उसके पहले तक जिला मुख्यालय की निकाय कांग्रेस के ही कब्जे में सतत बनी रही। पार्षदों की पसंद व मनोनयन से कांग्रेस समर्थित अध्यक्ष बनते चले गए। पहली दफा 1998 में इस सिलसिले पर ब्रेक लगा। इससे पहले प्रत्यक्ष निर्वाचन में भाजपा ने कांग्रेस की पूर्व विधायक गंगाबाई को पार्टी में शामिल करते हुए उम्मीदवार बनाया। वे चुनाव जीती और पहली भाजपा की झाबुआ नपा में अध्यक्ष बनीं।

भाजपा फायदे में ही रही

फिर 1999 में झाबुआ की जनता को अध्यक्ष चुनने का अवसर मिला था। उन्होंने भाजपा प्रत्याशी रेलम चौहान को बड़े अंतर से विजयश्री दिलवाई। 2004 में पर्वत मकवाना व 2012 के चुनाव में भी भाजपा उम्मीदवार पर्वत मकवाना और धनसिंह बारिया को ही प्रयत्क्ष प्रणाली से अध्यक्ष बनने का अवसर मिला। कांग्रेस को अपवादस्वरूप केवल पिछले यानी 2017 के चुनाव में अध्यक्ष पद मिला जब मनु डोडियार को जनता ने इवीएम पर अपना आक्रोश निकालते हुए चुन लिया।

यह अनुभव अच्छे नहीं

- आरक्षण व्यवस्था लागू करते हुए 1994 में नपा चुनाव हुए तो पार्षदों ने ही अध्यक्ष चुना था। कांग्रेस का बहुमत था व भाजपा के केवल दो पार्षद थे, मगर चुनाव जीतने के बाद सभी की राग एक हो गई थी। हर दिन अध्यक्ष को अविश्वास प्रस्ताव लाने का पार्षद डर दिखाते थे। लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार पार्षदों ने तत्कालीन अध्यक्ष फिलु ताहे.ड को हटा ही दिया। फिर मनोनयन का खेल भोपाल से चला।

- झाबुआ नपा में 1982-83 के चुनाव होते ही चार पार्षदों ने अपना मजबूत गठबंधन बना लिया जो किसी भी निर्णय को प्रभावित करने के लिए एक बड़ा दबाव समूह बन गया, क्योंकि कुल पार्षद ही 13 जीतकर आए थे। इस समूह ने वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हरिप्रसाद अग्निहोत्री को अध्यक्ष बनाया। जब उन्हें लगा कि मनमर्जी का नहीं हो रहा तो उन्होंने कुछ समय मे अविश्वास प्रस्ताव लाकर उन्हें हटा दिया ।

दलीय निष्ठा फीकी हुई

90 के दशक में रानापुर नगर पंचायत के 15 वार्डों में से आठ पर भाजपा व सात पर कांग्रेस के उम्मीदवार जीते। दोनों दल के नेता अपने-अपने पार्षदों को लेकर अध्यक्ष पद पर चुनाव के लिए वोटिंग करवाने आए । संख्या बल भाजपा की जीत सुनिश्चित बता रहा था, किंतु जब अध्यक्ष पद का परिणाम घोषित हुआ तो कांग्रेस के उम्मीदवार को आठ व भाजपा के अध्यक्ष उम्मीदवार को सात वोट ही मिले । कांग्रेस जब अपने अध्यक्ष को लेकर विजयी जुलूस निकाल रही थी, तब भी उसमें सात पार्षद ही थे । दूसरी तरफ हारने वाला भाजपा का खेमा बहुमत यानी आठ पार्षदों के साथ मायूस खड़ा था । किसी एक पार्षद की क्रॉस वोटिंग ने परिणाम ही बदल दिए। भाजपा उसको अधिकृत तौर पर कभी ढूंढ नहीं पाई,केवल कयास चलते रहे ।

जुलाई में आचार संहिता

झाबुआ नपा चुनाव के लिए एक माह के बाद कभी भी शुरुआत हो सकती है । सबसे पहले वार्डों के आरक्षण होना है । इसके बाद माना जा रहा है कि जुलाई में आचार संहिता लग जाएगी। अगस्त में पहले पार्षद पद के लिए और कुछ समय बाद अध्यक्ष पद के लिए निर्वाचन हो सकते हैं । वैसे भी सितंबर के प्रथम सप्ताह में वर्तमान परिषद का कार्यकाल खत्म हो जाएगा।

अप्रत्यक्ष प्रणाली के लाभ

- हर वार्ड पर परिषद पर्याप्त ध्यान देने को मजबूर

- पार्षदों की सुनवाई ज्यादा होने लगती है

- अध्यक्ष अपनी मर्जी नहीं थोप सकता

- बहुमत का महत्व हमेशा बना रहता है

- सामूहिक जिम्मेदारी तय होती है

प्रत्यक्ष प्रणाली के नुकसान

-अध्यक्ष निरंकुश बन जाता है

- वार्डों के विकास में भेदभाव होता है

- पार्षदों को महत्वहीन कर दिया जाता है

- केवल कुछ के सहारे नगर सरकार चलने लगती है

-आर्थिक गड़बड़ियों पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता

यह घातक हो जाता है

- जब पार्षदों की खरीदी शुरू हो जाती है

- उन्हें अध्यक्ष के चुनाव के पूर्व छिपा दिया जाता है

- क्रॉस वोटिंग के समझौते हो जाते हैं

- दलीय सिद्धांत हवा में उड़ जाते हैं

एक नजर में

- 1930 में झाबुआ नपा का गठन हुआ

- 7-8 गणमान्य व्यक्तियों की कौंसिल बनी

- 1994 में पहली बार आरक्षण व्यवस्था

- 1998 में पहली बार प्रत्यक्ष प्रणाली

- 2017 अगस्त में पिछला चुनाव

ऐसे हुआ चुनाव

- 18 वार्ड 2017 में रहे

- 2 वोट अध्यक्ष-पार्षद के लिए डले

- 27 हजार के करीब मतदाता रहे

- 9 पार्षद व अध्यक्ष पद कांग्रेस के खाते में

- 4 पार्षद पद भाजपा को मिले

- 5 पार्षद निर्दलीय उम्मीदवार बन गए

अलग-अलग प्रतिक्रिया

- भाजपा के पूर्व जिला मंत्री व नगर मंडल अध्यक्ष विजय नायर का मानना है कि प्रत्यक्ष प्रणाली से ही अध्यक्ष का चुनाव करवाना बेहतर व्यवस्था थी। अब पार्षद अपनी पसंद से अध्यक्ष चुनेंगे तो कई तरह की सौदेबाजी को बढ़ावा मिलेगा । नगर विकास की बजाए नपा दंगल का स्थान बन सकता है । पार्षदों की ईमानदारी व निष्ठा पर ही अप्रत्यक्ष प्रणाली पूर्णतः निर्भर है । राजनीति में वैसे ही इस समय प्रमाणिकता का संकट है।

- जिला कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष शांतिलाल पडियार का कहना है कि अध्यक्ष को सीधे जनता चुनती है तो उस पर दबाव रहता है । अब पार्षदों के हाथों में अधिकार आने के बाद दिक्कत बढ़ेगी । इस तरीके के निर्वाचन के अनुभव अच्छे नहीं है । जनादेश का अपमान करते हुए पार्षद अपने हिसाब से अध्यक्ष को चलाते हैं और काम नहीं करने देते हैं । सौदेबाजी भी बढ़ जाती है । यह विकास की गति को प्रभावित करती है । दोनों तरीके से परिषद चुनकर देख चुके हैं । महापौर व निकायों के अध्यक्ष को लेकर अलग-अलग निर्णय समझ से परे है ।

Posted By: Nai Dunia News Network

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