झाबुआ (नईदुनिया प्रतिनिधि)। नवकार महामंत्र उसी प्रकार कई रहस्यों से भरा पड़ा है, जैसे समुद्र रत्नों से भरा हुआ है। इस मंत्र के रहस्य को जानना है तो नवकार मय बनना होगा। इसके लिए एकाग्र मन से नवकार मंत्र की साधना करना होगी। नवकार मंत्र के बाहर कुछ नहीं है । आवश्यकता है इसके भीतर प्रवेश करने की। इस मंत्र की शुरुआत ही नमो से होती है । यह नमो हमें पंच परमेष्टि तक पहुंचने में सेतु का कार्य करेगा।

उपरोक्त प्रेरक उद्बोधन झाबुआ में चल रहे पूज्य आचार्य श्रीमद् विजय नित्यसेन सूरी जी व साधु-साध्वी मंडल की निश्रा में आत्मानंदी चातुर्मास अंतर्गत नौ दिवसीय नवकार आराधना में प्रतिदिन दोपहर में चल रहे नवकार तू ही आधार प्रवचन माला में मुनिराज निपुणरत्न विजय जी मसा ने व्यक्त किए। उन्होंने नवकार के समस्त पदों का विस्तृत विवेचन किया। उन्होंने कहा कि नमो हमें अहंकार नहीं करने का संदेश देता हैं। श्री गौतम गणधर को प्रभु महावीर तभी मिले, जब उन्होंने नमो को महत्व देकर अहंकार का त्याग किया।

साधु पद को प्रयोगशाला का दर्जा दिया

उन्होंने कहा कि नवकार आराधक तभी सच्चा नवकार मंत्र का साधक हो सकता, जब वो इन सभी नवकार मंत्र के पदों का आशय समझे। सबसे पहले नमो अरिहंताणम पद को दानशाला यानी देने की भावना हमेशा रखना, सिद्धपद को विश्रामशाला यानी यहां तक पहुंच कर विश्राम को प्राप्त करना। आचार्य पद को धर्मशाला यानी सम्यक ज्ञान, दर्शन, चरित्र को प्राप्त करना, उपाध्याय पद को ज्ञानशाला यानी संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करना और साधु पद को प्रयोगशाला का दर्जा दिया गया है। जिसमें मन, इंद्रियों पर नियंत्रण, स्वाध्याय आदि करना चाहिए और आत्मा को पुष्ट करना। उन्होंने कहा कि सच्चा नवकार के आराधक वही है जो पंच परमेष्टि की शरण में होकर किसी भी जीव के लिए अरुचि, तिरस्कार, दुर्भावना नहीं रखे सद्भाव ही रखें। उन्होंने कहा कि मन को यदि नवकार से जोड़ दे तो इंद्रियों पर नियंत्रण हो सकता है। हमें नवकार मंत्र तो मिला है, लेकिन नवकार मंत्र में क्या है वह नहीं मिला है। नवकार मंत्र आराधना के पंचम दिवस सोमवार पूज्य आचार्य श्रीमद् विजय नित्यसेन सुरीश्वर जी मसा और साधु-साध्वी मंडल की निश्रा में भावयात्रा संपन्ना हुई। सोमवार को एकासना करने का लाभ सुभाषचंद्र , कमलेश कुमार सुजानमल कोठारी परिवार ने लिया।

मिथ्यात्व का उदय होने पर जीव अशुभ व क्रूर क्रियाएं करता है : जिनेंद्र मुनि

-तपस्वी का वरघोड़ा निकाला गया

झाबुआ (नईदुनिया प्रतिनिधि)। आत्मोद्धार वर्षावास के अंतर्गत सोमवार को स्थानक भवन में प्रवचन में पूज्य जिनेंद्र मुनि जी महाराज ने कहा कि अनादि काल से जीव संसार में परिभ्रमण करते हुए कभी सामान्य रूप से तो कभी विशेष रूप से पाप कर्म का बंध करता आया है। वह मन वचन काया से कर्म का बंध कर उस अनुसार आचरण कर महा मोहनीय कर्म का बंध करता है।

उन्होंने कहा कि महा मोहनीय कर्म बांधने के 30 कारणों में से एक कारण यह भी है कि व्यक्ति में क्रूरता के भाव आने पर वह जीव का मुंह ढंक कर आंख, कान ढंक कर उसे मारता भी इस तरह है कि वह बोल भी नहीं सकता है। बड़ी निर्दयतापूर्वक जब तक प्राण ना निकले तब तक मारता रहता है। जीव के हृदय में जब निर्दयता, दया के भाव नहीं आते हैं, तब तक ऐसी क्रूरता क्रिया करता रहता है। ऐसे क्रूर भाव आने पर व्यक्ति का चेहरा लाल हो जाता है आंखे, हाथ-पैर फुल जाते हैं वह राक्षस बन जाता है। व्यक्ति की निर्दयता इतनी चरम सीमा पर पहुंच जाती है कि उसे कुछ भी भान नहीं रहता है। यहां तक कि वह मूक प्राणियों की भी हत्या कर देता है। पशुओं के प्रति भी वात्सल्य, प्रेमभाव रखना चाहिए, क्योंकि पशुओं में भी प्राण होते हैं। परंतु जब हृदय में क्रूरता, निर्दयता के भाव आते हैं तो उसे कुछ नहीं सूझता है कभी-कभी स्वार्थ से प्रेरित होकर भी वह ऐसे कार्य करता है। ऐसी क्रिया करने पर वह चिकने और गाढ़े कर्म का बंध करता है।

जीवों को सुख-दुख का मार्ग बताया

धर्मसभा में पूज्य संयत मुनि जी ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने चारों गति में दुख को देखा, उन्हें संयम में सुख लगा। संसार छोड़कर संयम ग्रहण करने की बात बताई। उन्होंने जीवों को सुख-दुख का मार्ग बताया। संसार में दुख ही दुख है। संसारी व्यक्ति संयमी साधक से ज्यादा दुखी है। साधु को भी गर्मी पानी, आहार, खराब सड़क आदि अनेक प्रकार के परिषद आते हैं। परंतु वह थोड़े समय के ही होते हैं। परंतु संसारी व्यक्ति के दुख लंबे समय के होते हैं। धर्म आराधना करते समय दुख आए तो यह विचार करें कि यह दुख लंबे समय तक नहीं रहेगा। थोड़े समय के बाद सुख ही सुख प्राप्त होगा। उन्होंने कहा कि 22 परिषद में अज्ञान परिषह लंबे समय तक रहता है। परिषह स्वयं के कारण भी आते हैं तथा दूसरे भी देते हैं। तिर्यंच, मनुष्य, देवता भी उपसर्ग देते हैं। दुख ज्यादा समय तक नहीं रहता है। कोरोना दो वर्ष तक आया बहुत दुख दिया, लेकिन अब शांत हो गया। पहले कई वर्ष तक महामारी आई थी उसमें भी कई दुखी हुए पर वह भी चली गई है। दुख भी अनित्य है पुण्य जनित सुख भी अनित्य है। पुण्य कर्म का जब उदय होता है, तो जीव दुखी नहीं होता है, उसे सांसारिक सुख मिलता है। लेकिन पाप कर्म का उदय होने पर जीव दुख ही दुख प्राप्त करता है। संसारी जीव को दुख आते हैं परंतु वैराग्य विरले व्यक्तियों को ही आता है।

सोनल कटकानी ने 30 उपवास पूर्ण किए

सोनल संजय कटकानी के 30 उपवास पूर्ण होने पर जयकार यात्रा निकाली गई। इसमें बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविका शामिल होकर तपस्वी की जयकार के गगनभेदी नारे लगाते हुए निकले । सभी ने तपस्या की अनुमोदना की। सभा में संजेली रतलाम और अन्य स्थानों से गुरुभक्त दर्शनार्थ पधारे। तपस्या के दौर में राजकुमारी कटारिया ने 31 उपवास, रश्मि मेहता ने 29, रश्मि, निशिता रूनवाल, नेहा, चीना घोड़ावत ने 28 उपवास, अक्षय गांधी ने 27 उपवास के प्रत्याख्यान गुरुदेव के मुखारविंद से ग्रहण किए। संघ के 10 तपस्वी वर्षीतप कर रहे हैं। अन्य तपस्वियों द्वारा सिद्धि तप, मेरू तप और अन्य तपस्या की जा रही है। आयंबिल, तेला तप की लड़ी चल रही है। प्रवचन का संकलन सुभाष ललवानी द्वारा किया गया। संचालन केवल कटकानी ने किया।

Posted By: Nai Dunia News Network

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