यशवंत सिंह पंवार * झाबुआ (नईदुनिया प्रतिनिधि)। आदिवासी बहुल जिले झाबुआ में जागरूकता की कमी कई कार्यक्रम फ्लॉप कर देती है। ऐसा ही कुछ परिदृश्य जिंदगी को सुरक्षा देने वाले कोरोना टीकाकरण के मामले में भी बना हुआ था। टीके को लेकर तरह-तरह की गलतफहमियां इस क्षेत्र में आगे बढ़ने से रोक रही थीं। राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत कार्यरत साथिया ने सामाजिक रस्म को ही माध्यम बनाते हुए घर-घर में पीले चावल वितरित करते हुए ग्रामीणों को टीकाकरण केंद्र पर समझाइश देकर बुलवाया और देखते ही देखते नरसिंहरुंडा न केवल झाबुआ जिले का बल्कि प्रदेश का 100 प्रतिशत टीकाकरण वाला पहला गांव बन गया।

जिला मुख्यालय से 19 किमी दूर बसे नरसिंहरुंडा की 183 आबादी में से 18 वर्ष से अधिक आयु के 118 ग्रामीणों को टीके लगना थे। नाममात्र के ग्रामीण टीका लगवाने आगे आ रहे थे। उनमें यह धारणा थी कि टीका लगवाने से मौत हो जाती है, महिलाएं गर्भवती नहीं बन पाएंगी और अन्य स्वास्थ्य समस्या पैदा होगी।

मुहिम चलाई गई

राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जिले में तैनात 2026 किशोर-किशोरियां स्वास्थ्य, लैंगिग हिंसा व पोषण आदि से जुड़े बिंदुओं पर टीम बनाकर पहले ही कार्य कर रहे थे। कोरोना को देखते हुए इस साल मई-जून में उन्हें टीकाकरण को लेकर जागरूकता बढ़ाने में भी लगा दिया गया। इस मुहिम का सबसे सकारात्मक असर नरसिंहरुंडा में देखने को मिला।

ऐसे बना इतिहास

गांव की साथिया संगीता पचाया, किशोर पचाया और पड़ौसी कस्बे कालीदेवी की साथिया हर्षाली पुरोहित ने घर-घर जाकर पीले चावल देते हुए निरंतर ग्रामीणों को टीकाकरण केंद्र पर बुलवाना शुरू कर दिया। संगीता का कहना है कि खुद व स्वजन ने टीका लगवाते हुए सबसे पहले ग्रामीणों की गलतफहमी दूर की। समझाइश से आखिरकार बात बन गई। इसके अलावा दीवार लेखन भी माहौल बनाने के लिए किया गया।

चिकित्सा क्षेत्र में सेवा देना चाहती है हर्षाली

बीएससी फर्स्ट इयर की छात्रा हर्षाली पुरोहित कालीदेवी में रहती हैं। पिताजी वाहन चालक हैैं। हर्षाली चिकितत्सा के क्षेत्र में समाजसेवा करना चाहिती हैं। हर्षाली का कहना है कि शुरुआत में उन्हें अपमान भी सहना पड़ा। उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें भगाया गया। वे अपनी मुहिम में डटे रहे। सामाजिक रस्म अदायगी भी असरकारक रही। पीले चावल घर-घर में देने से एकदम वातावरण बना।

प्रशिक्षण दिया

कार्यक्रम के समन्वयक अजहर उल्ला खान ने बताया कि हर आशा कार्यकर्ता के साथ एक-एक किशोर-किशोरी रखे गए हैं। इन्हें साथिया कहा जाता है और गांव में अपनी उम्र के बच्चों को लेकर वे एक टीम बनाते हैं और बैठकें व प्रशिक्षण आयोजन रखते हुए हर मुद्दा समझाते हैं। बच्चों के माध्यम से परिवारों और फिर समाज मे बात पहुंचाना आसान हो जाता है। टीकाकरण कार्यक्रम में साथिया के लग जाने से एकदम परिदृश्य बदला।

Posted By: Nai Dunia News Network

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