खंडवा/खालवा। नईदुनिया प्रतिनिधि। Khandwa News खंडवा वनमंडल में सतपुड़ा की पहाड़ियों के बीच कालीभीत के जंगलों में कीमती वनस्पति और जड़ी बूटियों का खजाना है, वहीं दुर्लभ प्रजाति के वन्य प्राणी और पक्षी भी हैं। हाल ही में यहां दुर्लभ प्रजाति की उड़न गिलहरी भी नजर आई है। यह उड़ने वाली गिलहरी देश के अन्य जंगलों और अभयारण्य में कम ही बची है। इसकी मौजूदगी से खालवा क्षेत्र के जंगल का महत्व और बढ़ गया है। जंगल में वन्य प्राणियों की गतिविधियों व सुरक्षा के लिए लगे नाइट विजन कै मरे में वन्य प्राणियों के बीच उड़न गिलहरी की गतिविधि भी कै द हुई हैं।

खालवा के जंगलों में चीता, तेंदुआ, नीलगाय, चौसिंगा, भालू सहित विभिन्न् प्रकार के शाकाहारी और मांसाहारी वन्य प्राणी, पशु व पक्षी मौजूद हैं। इनके बीच यहां दुर्लभ उड़न गिलहरी भी पाई जाती है। यह दुर्लभ वन्य प्राणी के रूप में जानी जाती है। इनकी मौजूदगी से यह क्षेत्र कि सी अभयारण्य से कम नहीं है। यह विलुप्त होने की कगार पर है। भारत में मध्य प्रदेश और राजस्थान के सीमावर्ती सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य और महुआ अ सागौन के सघन जंगलों में मिलती है।

निशाचर प्राणी है

वनपरिक्षेत्र खालवा के वनपरिक्षेत्र अधिकारी उत्तम सिंग सस्तिया ने बताया कि इस क्षेत्र का जंगल दुर्लभ वन्य प्राणियों से भरा पड़ा है। राष्ट्रीय अभयारण्यों से भी अधिक व विभिन्न् प्रजाति के वन्य प्राणी यहां है। इस क्षेत्र में उड़न गिलहरी भी देखने को मिली है। यह नेवले के आकार की होती है और पेड़ के कोठर में रहती है। यह निशाचर प्राणी होने से रात्रि में भोजन की तलाश में निकलती है। दिन में शिकारी पक्षियों का खतरा होने से यह शाम ढलने के बाद ही बाहर आती है। भोजन की तलाश में एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर भटकती रहती है। हाल ही में घायल अवस्था में एक गिलहरी मिलने पर वन परिक्षेत्र अधिकारी द्वारा उसका उपचार भी करवाया गया।

यह ग्लाइड करती है

उड़न गिलहरी की खूबी है कि यह एक पेड़ से दूसरे या नीचे उतरने के लिए ग्लाइड करती है। यह विचरण करते समय अपने चारों पैरों को समान दूरी पर फै लाती है। पैरों के बीच की लचीली चमड़ी एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग लगाते समय पैराशूट के रूप में खुलती है। इससे वह आसानी से अपने शरीर को नियंत्रित कर हवा में सुरक्षित छलांग लगती है, इसलिए इसे उड़न गिलहरी कहा जाता है। यह 20 से 40 फीट तक संतुलन बनाकर छलांग लगती है।

उड़ती नहीं फिसलती है

उड़ने वाली गिलहरी शाकाहारी प्राणी है। इसका वैज्ञानिक नाम टेरोमायनी या पेटौरिस्टाइनी है। जो पीटाॉरिस्ट फिलिपेंसीस परिवार की गिलहरी की 50 प्रजातियों में से भारत में 12 पाई जाती है उनमें से यह एक है। इस क्षेत्र में कम ही पाई जाती है। सघन वन और फल-फू ल वाले इलाकों में यह रहती है। पक्षियों और चमगादड़ की तरह उड़ नहीं सकती है। शरीर पर कलाई से टखने तक फै ली पैराशूट जैसी झिल्ली की मदद से यह फिसलने में सक्षम होती है।

- विवेक के शोरे, व्याख्याता प्राणी शास्त्र विभाग, एसएन कॉलेज खंडवा

Posted By: Hemant Upadhyay

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

नईदुनिया ई-पेपर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

डाउनलोड करें नईदुनिया ऐप | पाएं मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और देश-दुनिया की सभी खबरों के साथ नईदुनिया ई-पेपर,राशिफल और कई फायदेमंद सर्विसेस

जीतेगा भारत हारेगा कोरोना
जीतेगा भारत हारेगा कोरोना