खंडवा। शहर की आबादी के हिसाब से 27 साल पहले खंडवा को नगर निगम की सौगात मिली थी। पहली नगर निगम परिषद में कई नीतिगत और चौकाने वाले फैसले होने से इसका कार्यकाल सबसे अधिक चर्चित और प्रयोगधर्मिता की पाठशाला माना जाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण निर्णय महापौर के कार्यकाल को ढाई साल से बढ़ाकर पांच साल करना रहा। वैसे यह निर्णय प्रदेश की सभी 13 नगर निगम में लागू हुआ लेकिन तत्कालीन स्थानीय शासन मंत्री तनवंतसिंह कीर द्वारा यह कदम खंडवा नगर निगम में अपनी समर्थक महापौर अणिमा उबेजा को पद पर काबिज रखने और कांग्रेस के ही प्रतिद्वंद्वी शिवकुमार गुट के पार्षद को महापौर बनने से रोकने के लिए उठाने की चर्चा रही। इसके अलावा महापौर को लालबत्ती का रूतबा भी इसी दौरान मिला।

प्रदेश की विभिन्ना नगर निगमों में पहली परिषद के अनुभव और गुटबाजी को देखते हुए तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा सबसे बडा फैसला महापौर का चुनाव अप्रत्यक्ष की बजाए प्रत्यक्ष रूप से करवाने का निर्णय लिया गया। इसके साथ ही उप महापौर का पद समाप्त कर परिषद अध्यक्ष की व्यवस्था की गई। पहले परिषद में सभापति की हैसियत से महापौर ही बैठकों की अध्यक्षता करते थे।

तत्कालीन पार्षद आज के वरिष्ठ नेता

खंडवा में पहली निगम परिषद को ऐतिहासिक माना जाता है। इसमें आज भाजपा और कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकांश नेता पार्षद थे। इनमें भाजपा के जिला अध्यक्ष रहे राजेश डोंगरे, पुरुषोत्तम शर्मा, हरीश कोटवाले, सिंधी पंचायत के वर्तमान अध्यक्ष गेहीराम सीतलानी, ममता बोरसे, त्रिलोक यादव, प्रकाश यादव शामिल थे। वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुभाष नागोरी, शांतनु दीक्षित, अरुण सेठी, सलीम पटेल सहित कई नेता शामिल थे।

पार्षद को मिलता था पांच सौ रुपये वेतन

पहली परिषद में पार्षदों को पांच सौ रुपये वेतन प्रतिमाह मिलता था। वहीं महापौर का वेतन 15 सौ रुपये था। वहीं अब पार्षदों का वेतन 6200 रुपये प्रति माह हो गया है। पहली से पांचवीं परिषद बनने तक वेतन में दस गुना से अधिक की वृद्धि हो चुकी है।

उप महापौर के लिए मचा था घमासान

पहली परिषद में महापौर की तरह उप महापौर के लिए अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव हुआ था। इस पद के लिए कांग्रेस के दो गुट और भाजपा ने अपना प्रत्याशी खड़ा किया था। कांग्रेस के शिवकुमार गुट से पार्षद रमजान भारती और निष्ठावान कांग्रेस गुट से पार्षद सलीम पटेल मैदान में थे। वहीं भाजपा ने पार्षद राजेश डोंगरे को उतारा था। गुटबाजी और राजनीति जोड़-तोड से शिवकुमार सिंह गुट से रमजान भारती को सबसे अधिक मत मिलने से वे उप महापौर पद पर काबिज हुए थे। उसके बाद उप महापौर का पद समाप्त हो गया था। इसकी जगह अधिकार संपन्ना परिषद अध्यक्ष की परंपरा शुरू हुई।

Posted By: Nai Dunia News Network

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