पिपल्याबुजुर्ग (नईदुनिया न्यूज)। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में 25 जून 1975 का दिन आज भी लोगों के मन मस्तिष्क में अंकित है। यह वह दिन था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आपातकाल लगा दिया था। इस दौरान विपक्षी दलों के कई नेताओं को जेलों में बंद कर दिया था। उस दौर को याद करने वाले लोगों ने अपने कुछ संस्मरण सुनाए। ग्राम के वरिष्ठ मांगीलाल जायसवाल ने बताया कि उस समय कांग्रेस का एक छोटा-सा कार्यकर्ता भी सत्ता का दुरुपयोग कर सकता था। हम लोग अपनी विचारधारा के लोगों से बात करने में भी भय अनुभव करते थे, क्योंकि हम कांग्रेसी विचारधारा के नहीं थे। सत्ता का ऐसा तांडव आज भी मुझे याद है। ग्राम बड़दिया सुर्ता के विनोद सोनतले का कहना है कि मैं और मेरा परिवार हमेशा से जनसंघ की विचारधारा से प्रभावित रहा और इसे सब लोग जानते थे। मेरे परिवार के बारे में कुछ लोगों ने करही थाने पर खबर कर दी। एक जवान के माध्यम से मुझे गांव में पुलिस ने बुलाया और पूछा- आप विनोद हैं। मैंने कहा हां मैं उस समय नेकर पहनकर ही गया इसलिए गौर से देखा और कहा घर जाओ, पर अब ध्यान रखना। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि पुलिस ने मुझे ध्यान रखने का क्यों कहा। उस दौर में हम अपनी विचारधारा पर बात करने में भी असहज महसूस करते थे

दुकान पर आकर पूछते थे लोग

ग्राम के रघुनाथ नीलकमल बताते हैं कि उन दिनों में मैं एक पान की दुकान चलाता था। पुलिस के लोग मेरी दुकान पर आते थे और एक प्रश्न पूछते थे कि भाई यहां पर कोई जनसंघ की विचारधारा का तो नहीं है। जब 1977 में चुनाव परिणाम घोषित हुआ और इंदिरा गांधी चुनाव हार रही थी, यह बात मीडिया से प्रसारित हुई। हम लोगों ने सुना भी परंतु कोई भी बोलने को तैयार नहीं। उस डर और खौफ के वातावरण कि आज भी चर्चा होती है। ग्राम के वरिष्ठ मनोहर मंजुल ने बताया कि आपातकाल घोषित किए जाने के अगले दिन नईदुनिया ने अपने अग्रलेख वाले कालम को खाली छोड़कर ऊपर केवल आपातकाल लिखा था। उन दिनों लोकनायक जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति नारा और आंदोलन जोरों पर था। इसके साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने तत्कालीन सत्ता को लोकतांत्रिक मूल्यों से पृथक कर दिया और यह मैं अनुभव कर रहा था कि कोई बड़ा ऐसा कदम उठाया जाने वाला है जो लोकतंत्र को समाप्त कर देगा और वही हुआ। उन दिनों गैर कांग्रेस की विचारधारा पर बात करना भी जोखिमपूर्ण हुआ करता था। ऐसा किसी विषय पर बात करने के पूर्व हम लोग चारों ओर देख लेते थे कि हमारी बात को कोई सुन तो नहीं रहा है। वह कालखंड आज भी मुझे किसी बुरे सपने की तरह लगता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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