पिपल्याबुजुर्ग (नईदुनिया न्यूज)। एकल परिवारों के प्रचलन ने संयुक्त परिवारों की प्रणाली को लगभग समाप्त कर दिया है। परिवार नाम की संस्था अब लगभग विलुप्त के कगार पर पहुंच रही है। इस कठिन दौर में भी कई परिवार संयुक्त रूप से रह रहे हैं। ग्राम बेरफड़ के लगभग 70 वर्षीय रघुवीरसिंह तवर बाघवाले सात बेटों के परिवार के 27 सदस्यों के साथ रह रहे हैं। तवर बताते हैं कि संयुक्त परिवार का सुख कुछ और ही है। यहां सब एक दूसरे के समस्याओं को साझा करते हैं। खुशी-खुशी साथ रह रहे हैं। परिवार के सदस्यों की खुशी के रहस्य को उन्होंने कहा कि परिवार के छोटे से छोटे सदस्य की भावनाओं का सम्मान किया जाए तो परिवार टूटने से बच जाता है। यही एक बड़ा कारण है कि हम सब लोग साथ में रह रहे हैं। ग्राम पिपल्याबुजुर्ग के रघुनाथ सेप्टा नीलकमल चार बेटों के परिवार के साथ रह रहे हैं। परिवार में 17 सदस्य है। उन्होंने बताया कि बच्चों को बेहतर परवरिश दी। शिक्षा के साथ वह संस्कार भी दिए जो उन्हें साथ में रहने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि साथ में रहने का एक अद्भुत सुख है। जब हम सदस्यों के साथ भोजन करते हैं तो निश्चित ही यह एक अद्भुत क्षण होता है। पारिवारिक एकता ही प्रगति का मूल आधार होती है। आज खुशी यह है कि हमारे बीच ना मतभेद है ना ही मन भेद है।

संयुक्त परिवार जीवन का अद्भुत सुख

ग्राम के 71 वर्षीय सावित्री देवी सिन्हा पूरे गांव में संयुक्त परिवार की मिसाल है। उन्होंने परिवार के विकास व समृद्धि के लिए हर संभव प्रयास किया। सावित्रीदेवी ने अपने स्वर्गीय पति रघुनाथ सिन्हा के साथ न केवल अपने परिवार बल्कि काका ससुर के परिवार को भी स्थापित करने में भरपूर योगदान दिया। कारण व परिस्थितिवश आज वह परिवार से कुछ दूरी पर है, किंतु उन परिवारों में उनकी उपस्थिति आज भी अहमियत रखती है। ग्राम के 70 वर्षीय मनोहर मंजुल बताते हैं कि वे अपने पिता व दादा के साथ रहे हैं। अब अपने बेटे व बहू के साथ रह रहे हैं। उन्होंने चार पीढ़ियों को देखा है। संयुक्त परिवार का एक ऐसा अद्भुत सुख है जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। मंजुल ने बताया कि उनकी दो बेटियां और एक बेटा कब बड़ा हो गया, कब उनका शिक्षण पूरा हो गया, कब उनकी शादी हो गई और वह कब परिवार वाले हो गए पता ही नहीं चला। पिता व मां ने बच्चों को बेहतर शिक्षा और संस्कार दिए।

Posted By: Nai Dunia News Network

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