सनावद। जिनवाणी का उपदेश यदि एक बार समझ में आ जाए तो फिर बार-बार प्रवचन सुनने की आवश्यकता नहीं होती। धर्मोपदेश वही है जो हृदय की अंतरंगता को स्पर्श करे। आत्मा व शरीर जुदा-जुदा है। यही उपदेश का सार है। सारा जिनागम व संपूर्ण उपदेश इसी को समझने में लगता है।

यह बात युवा मुनिश्री प्रमेयसागरजी महाराज ने नवोदित तीर्थ सिद्धाचल पोदनपुरम के 12वें स्थापना दिवस के अवसर पर रविवार को कही। स्थापना दिवस मुनिश्री समतासागरजी, मुनिश्री प्रमेयसागरजी सहित पांच दिगंबर मुनि व ऐलक महाराज के सान्निाध्य में उत्साहपूर्वक मनाया गया। सुबह भगवान बाहुबलीजी का चरणाभिषेक, पूजन, शांतिधारा हुई। इसके बाद निर्वाण लाडू चढ़ाया गया।

पोदनपुरम तीर्थ प्रांगण में हुई धर्मसभा में मुनिश्री समतासागरजी महाराज ने भगवान बाहुबली के इतिहास से अवगत कराते हुए कहा कि बिना बोले भगवान बाहुबली ने जो संदेश दिया है वह अनुकरणीय है। वीतरागता के बिंब सम्यक्‌ दर्शन का कारण बनते हैं। जो बात ग्रंथ को पढ़कर समझ में नहीं आती, वह जिनबिंब के दर्शन से एक बार में समझ में आ जाती है।

भगवान बाहुबली व उनके भाई भरत चक्रवर्ती के कथानक का जिक्र करते हुए मुनिश्री ने कहा कि 'जो तेरा सो मेरा है मेरा भी तेरा है' की भावना से बाहुबली जगत में पूज्य हो गए। मुनिश्री ने कई उदाहरण से विषय को स्पष्ट किया। इस मौके पर बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद थे। मंगलाचरण कमल जैन व संचालन प्रशांत जैन ने किया। क्षेत्र के कार्य प्रभारी वारिश जैन ने योजनाओं व प्रगति की जानकारी दी। -निप्र