जितेंद्र पाटीदार, खरगोन। राम के आराध्य भगवान शिव और शिव की मानस पुत्री नर्मदा...। मध्य प्रदेश में ओंकारेश्र्वर-महेश्र्वर के मध्य पथरीले प्रवाह क्षेत्र में प्रचंड वेग से बहती नर्मदा प्राकृतिक शिवलिंगों का निर्माण भी करती है। नर्मदा की धारा से निकले ऐसे ही एक शिवलिंग को जिस पर प्राकृतिक रूप से 'ऊं' अंकित है, अयोध्या में नवनिर्माणाधीन श्रीराम मंदिर के प्रांगण में स्थापित किया जाएगा।

खरगोन जिले के कसरावद नगर के निकट नर्मदा के किनारे स्थित बकावां गांव की ख्याति शिवलिंग निर्माण के लिए है। गांव के अनेक परिवार पीढ़ियों से यही काम करते आए हैं। वैसे तो उम स्थल अमरकंटक से लेकर भरूच में समुद्र में समाहित होने तक, नर्मदा में मिलने वाले पत्थर खास गोलाई लिए होते हैं। इन पत्थरों का स्वरूप शिवलिंग जैसा ही होता है। लेकिन ओंकारेश्र्वर से महेश्र्वर के बीच मिलने वाले प्राकृतिक शिवलिंग नर्मदेश्वर शिवलिंग के रूप में ख्यात हैं। इनमें एक विशेष आभा होती है।

बकावां गांव के अनेक परिवार इन पत्थरों को चुनकर, निखारकर और चमकाकर शिवालयों में स्थापित होने योग्य बनाते हैं। हर आकार-प्रकार के शिवलिंग यहां मिल जाएंगे। स्थानीय जानकार डॉ. मिश्रीलाल शाह के मुताबिक पांच साल पहले जब यह स्वयंभू शिवलिंग मिला, जिसके शीर्ष पर 'ऊं' निर्मित है, उसी दिन से गांव वालों ने यह सोच लिया था कि यह शिवलिंग किसी प्रतिष्ठित मंदिर में ही स्थापित हो। देश-विदेश के कई खरीदार मुंहमांगी कीमत देने को तैयार थे। व्यापारी लगातार संपर्क कर रहे थे, लेकिन गांव वालों ने इसे किसी को नहीं दिया।

बीते दिनों श्रीरामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष नृत्यगोपाल दास महाराज से संपर्क कर उन्हें गांव वालों की इच्छा से अवगत कराया गया, तो उन्होंने इसे श्रीराम मंदिर प्रांगण में स्थापित करने की बात कही। स्थानीय नेता रणवीर पटेरिया और अशोक शर्मा ने बताया कि कोरोना संकट के समाप्त होते ही स्थिति जैसे ही सामान्य होगी, सभी लोग मंदिर निर्माण में श्रमदान करने अयोध्या जाएंगे और उसी दौरान यह शिवलिंग भी साथ ले जाएंगे।

ग्राम बकावां में दुर्गा, अनीता, मधु, उदय केवट, मिश्रीलाल केवट, महेश वर्मा, संतोष केवट, नयन केवट, लक्ष्मीनारायण केवट, हरेराम केवट आदि ऐसे कारीगर हैं, जो शिवलिंग निर्माण में वषोर् से जुटे हुए हैं। उनका कहना है कि नर्मदा से निकलने वाले शिवलिंगों में कई तरह की आकृतियां गणेश, हनुमान, त्रिशूल आदि नजर आते हैं। इनकी मांग बहुत होती है। प्राकृतिक शिवलिंग औसतन चार-पांच फीट के ही होते हैं।

बांध बनने से पहले इनकी गोलाई बहुत अच्छी होती थी। नर्मदा के पानी की धार में चट्टानों पर लगातार लुढ़कते रहने से ये शिवलिंग का आकार ले लेते थे, मानो तराशे गए हों। लेकिन बांध बनने के बाद अब जो शिवलिंग निकल रहे हैं, उन्हें अकसर तराशना पड़ता है।

हर कंकर शंकर

स्थापित तथ्य है कि नर्मदेश्र्वर शिवलिंग बिना प्राणप्रतिष्ठा के स्थापित हो सकता है। मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव ने पुत्री नर्मदा को वरदान दिया था कि उसका हर कंकर शंकर होगा। इसी कारण नर्मदा से निकले प्राकृतिक शिवलिंग की प्राणप्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती है।

Posted By: Hemant Kumar Upadhyay

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