इंदौर। मंदसौर गोलीकांड को लेकर विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित होगा या नहीं, गुरुवार को इसे लेकर उच्च न्यायालय में करीब आधा घंटा बहस चली। अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया। निर्णय आने के बाद ही तय होगा कि गोलीकांड के लिए कौन जिम्मेदार था? इसमें किसी तरह की अनियमितता हुई थी या नहीं। मृतकों के परिजन को मुआवजा देने में क्या सरकार ने नियमों की अनदेखी की थी।

करीब दो साल पहले प्रदेश में किसान आंदोलन के दौरान मंदसौर में पुलिस की गोली से 5 लोगों की मौत हो गई थी। इन सभी के परिजन को तत्कालीन मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद एक-एक करोड़ रुपए का मुआवजा मिल चुका है। गोलीकांड को लेकर 6 अलग-अलग याचिकाएं उच्च न्यायालय में हैं।

इनमें तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के उस निर्णय को भी चुनौती दी गई है जिसके आधार पर मृतकों के परिजन को एक-एक करोड़ रुपए का मुआवजा दिया गया। याचिका के कहा गया है कि मुआवजे की घोषणा से पहले यह जानने की कोशिश तक नहीं की गई कि मारे गए लोगों की आंदोलन में भूमिका क्या थी?

वे घटनास्थल पर क्यों गए थे? इन याचिकाओं में से एक याचिका मृतकों के परिजन की तरफ से भी दायर है। इसमें कहा है कि सिर्फ मुआवजा देने से कुछ नहीं होगा। जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए।

याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अभिभाषक आनंद मोहन माथुर ने पिछली सुनवाई पर आवेदन देकर गुहार लगाई थी कि मामले की दोबारा जांच करवाई जाए और इसके लिए विशेष जांच दल गठित किया जाए।

गुरुवार को न्यायमूर्ति एससी शर्मा और न्यायमूर्ति वीरेंदरसिंह की युगल पीठ में याचिकाओं पर बहस हुई। अभिभाषक माथुर ने एसआईटी के गठन को लेकर न्याय दृष्टांत भी प्रस्तुत किए। दूसरे याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अभिभाषक मोहनसिंह चंदेल ने गोलीकांड के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर हत्या का केस दर्ज करने की मांग की।

एक अन्य याचिकाकर्ता की तरफ से अभिभाषक आयुष पांडे ने मांग की कि पूरे मामले में एक बार फिर से जांच करवाई जानी चाहिए। कोर्ट ने सभी पक्षकारों की बहस सुनने के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया।