मालवा और मेवाड़ की सीमाओं के संगम पर स्थित प्राचीन और ऐतिहासिक नगर मंदसौर अपनी वैभवशाली पुरातन विरासत को लिए संपूर्ण अंचल में एक विशिष्ट पहचान रखता है। दरअसल उज्जैन के बाद प्राचीन, धार्मिक व सांस्कृतिक नगरी होने की प्रतिष्ठा मंदसौर को मिली है। प्रयोगों और परंपराओं की यह नगरी अवसरों को अनुकूलतम वातावरण प्रदान करती है। यहां के लोग कहते हैं कि यह नगर बाहर से आने वालों को खूब फलता है। राजस्थान की सीमा से सटे प्राचीन दशपुर में सुदूर क्षेत्र से जो भी उद्यमी आए, सफलता के पर्याय बन गए। ग्वालियर रियासत का एक बड़ा भूभाग मंदसौर क्षेत्र रहा है। प्राचीनकाल से दशपुर में सनातन संस्कृति के साथ ही जैन, बौद्ध साहित्य एवं चिन्हों से भी समृद्ध रहा है। ऐतिहासिक परिदृश्य पाषाणयुगीन शैलचित्र, गुफाएं, अभिलेख, प्रतिमाएं, किले, मुद्राएं और भी ना-ना प्रकार की पुरातत्व संपदा से परिपूर्ण है। विद्वान प्रदेश के चार प्राचीन नगरों में महेश्वर, विदिशा, अवंतिका के साथ दशपुर को भी रखते हैं। संस्कृत और हिंदी साहित्य की समृद्धता यहां की विशेषता रही है। क्रूर आक्रांता श्वेत हूणों का आतंक इतना अधिक फैल चुका था कि चीन ने उनके डर से दीवार बनाई जो दुनिया के सात आश्चर्यों में आज भी शुमार है। इन श्वेत हूण आक्रांताओं को मंदसौर के सम्राट यशोधर्मन ने ही पराजित कर विजय स्तंभ बनाया था। चितौड़ के बाद विजय स्तंभ मंदसौर के सौंधनी में ही है। सम्राट यशोधर्मन ने दशपुर को तत्कालीन समय देश की राजधानी बनाने का गौरव प्रदान किया। साहित्य और संस्कृति की यहां समृद्ध परंपरा रही है। कवि कुलगुरु महाकवि कालिदास की जन्मस्थली व कर्मस्थली के रूप में भी दशपुर को मान्यता दी गई है। कालिदास ने अपने ग्रंथों में अष्टमूर्ति दशपुर का उल्लेख किया है। महाकवि कालिदास का कार्यकाल लगभग साढ़े तीन हजार वर्ष पुराना है, जो इस नगरी की प्राचीनता को सिद्ध करता है। महाकवि ने अपने ग्रंथों में दशपुर, अष्टमूर्ति व शिवना का उल्लेख किया है। यह वह नगर है, जहां की ऊंची अट्टालिकाओं से राजस्थान की सीमा नजर आती थी। रहन-सहन रीति-रिवाज और संस्कृति पर राजस्थान का खासा प्रभाव है। सामाजिक व पारिवारिक रिश्तों का ताना-बाना भी राजस्थान से कुछ ज्यादा ही जुड़ा हुआ है। अष्टमूर्ति भगवान श्री पशुपतिनाथ महादेव और आद्यशक्ति नालछामाता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि नगर को धर्मक्षेत्र की ऊंचाइयां प्रदान करती है। मालवी व्यंजनों के लिए भी यह नगर दूर-दूर तक पहचाना जाता है। मालवा का प्रसिद्ध दाल-बाटी-बाफला विशिष्ट खाद्य व्यंजन है। मंदसौर के लोग नवाचारों को तत्काल स्वीकार करते हैं। शिवना नदी और तेलिया तालाब विरासत में मिले हैं। कहा जाता है कि रहने के लिए इससे अच्छी कोई जगह नहीं। यहां पहाड़ नहीं हैं, इसलिए भूकंप का खतरा नहीं है। समंदर नहीं तो तूफान का कोई डर नहीं है। अतिवृष्टि ना अनावृष्टि, शीत-ग्रीष्म भी समशीतोष्ण हैं। पर व्यावसायिकता व आधुनिकता से हरियाली से आच्छादित रहने वाला पठारी नगर मकानों का जंगल बन रहा है। जमीनों की कीमतें आसमान छू रही हैं। अफीम जैसे मादक पदार्थों की उत्पादक भूमि होने से मादक अपराधों का धंधा भी यहां खूब चल रहा है। प्राचीन अस्मिता ने इस नगर की गौरव पताका को इतना फहरा रखा है कि यहां की विकृतियां सतही हो गई हैं। उत्सव का कोई मौका दशपुरी कभी नहीं चुकते हैं। जुलूस और जलसों का नगर अब भंडारों में भी पहचान बना रहा है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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