मंदसौर। श्री हनुमन्त भागवत कर्मकाण्ड परिषद एवं भक्तों द्वारा आयोजित की जा रही श्रीमद भागवत कथा के सातवे दिवस में भागवताचार्य पं. मुकेश शर्मा नारायणजी ने कहा कि आज के इस कलयुग में यदि हम इंसानों को भक्त सुदामा की तरह सच्चा ईमानदार मित्र मिल जाए तो वह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण मिलने के समान होता है।

मित्रता के इस पवित्र रिश्ते में छल कपट के भाव प्रकट नहीं होना चाहिए। क्योंकि यह रिश्ता हमारे प्रभु भगवान श्रीकृष्ण एवं भक्त सुदामा की सुंदर मित्रता का था लेकिन आज के कलयुग में मित्रता के रिश्ते में ही छल कपट के भाव अधिक रखे जाते हैं। आज का इंसान स्वार्थ की भावना को रखकर अपने उसी सच्चे मित्र के साथ धोखा करता है जो सच्चा मित्र अपने जीवन में सबसे अधिक विश्वास अपने एक मित्र के उपर ही करता है। इंसान मित्रता के रिश्ते पर अपना पूर्ण विश्वास जताकर अपने सारे जीवन के कारोबार को मित्र के सामने साझा करता है लेकिन जिन कलयुगी मित्रों के मन में छल कपट स्थान कर बैठता है वह वह मित्र अपने सच्चे मित्र को भी गहरे से गहरा नुकसान पहुंचाने में क्षण भर की देर नहीं करता है। मित्रता का यह तो वह पवित्र रिश्ता है जिससे भगवान की भक्ति को जोड़ा गया है। मित्रता के इस रिश्ते में छल कपट के भाव प्रकट न हो यही सबसे बड़ा संदेश है। श्रीमद भागवत कथा के सातवें दिवस में पं. श्री नारायणजी ने भक्त सुदामा एवं भगवान श्रीकृष्ण की सुंदर मित्रता का वर्णन करते हुए कहा भक्त सुदामा की मित्रता भगवान श्रीकृष्ण से सांदीपनी आश्रम शिक्षा ग्रहण करते हुए होती है। भक्त सुदामा बड़े स्वाभिमानी ज्योति के परम ज्ञाता विद्वार ब्राह्मण थे। गुरू माता के द्वारा भक्त सुदामा एवं भगवान श्रीकृष्ण को जगल में संविदा चुनने के लिए भेजा जाता है जिसके भोजन के

लिए गुरू मां के द्वारा एक चने की पोटली दी जाती है। उस चने की पोटली के अंदर उसी नगर की गरीब बुढ़िया का श्राप इस कारण छिपा हुआ था कि क्योंकि वह चने की पोटली कुछ चोरों के द्वारा धन की पोटली समझकर गरीब बुढ़िया के घर से चुराया था जिस बुढ़िया के घर पर भोजन की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस कारण उस बुढ़िया का श्राप उन चने के अंदर था कि जो भी इसको ग्रहण करेगा वह दरिद्रता ही भोगेगा। वह पोटली चोरों के द्वारा आश्रम के अंदर फेंक दी जाती है। सारी परिस्थति में भक्त सुदामा जान चुके थे। इस कारण भगवान की

हिस्से के चने भी भक्त सुदामा ने ग्रहण करके अपने मित्र के उपर आने वाली दरिद्रता को भी स्वयं के उपर ग्रहण कर लिया। भक्त सुदामा की गरीबी से बच्चों को कई बार भुखा ही सोना पड़ता था इस परिस्थति को जानकर भगवान श्रीकृष्ण ने भक्त सुदामा को कई लोकों का नाथ बनाया फिर भी भक्त सुदामा ने अपना जीवन कच्ची कुटिया में रहकर ही भगवान की भक्ति में व्यतीत किया। अंत समय स्वर्ग को प्राप्त किया। श्रीमद भागवत कथा के सातवे दिवस में श्री हनुमन्त गुरूकुल के समस्त बटुकों को यज्ञोपवित संस्कार किया गया।

पं. शिवनारायण शर्मा के द्वारा समस्त ब्राह्मण बटुकों को वस्त्र दान किए गए। भागवत कथा के सातवे दिवस की आरती पं. शिवनारायण शर्मा, गजेन्द्र जोशी दानपुर, राजेन्द्र जोशी, प्रतापपुर, आनंदकुमार जोशी प्रतापगढ़, मांगीलाल जोशी चित्तौड़, पंकज जोशी राजगढ़, पंकज शर्मा इंदौर, विजय शर्मा उज्जैन, पवन भारद्वाज जावरा, रमेश सोनी शामगढ़, गजेन्द्रसिंह भाटी के द्वारा की गई।

Posted By: Nai Dunia News Network

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