मंदसौर/गांधीसागर(नईदुनिया प्रतिनिधि)। गांधीसागर अभयारण्य में अफ्रीकन चीतों के साथ ही टाइगर की दहाड़ भी गूंज सकती है। इसके लिए सभी विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। फिलहाल यहां पर वन्य प्राणियों के भोजन के इंतजाम के लिए चीतलों की संख्या बढ़ाने पर काम हो रहा है। अभी राजगढ़ जिले में स्थित नरसिंहगढ़ वन क्षेत्र से 500 चीतल लाने का लक्ष्य रखा गया है। गुरुवार तक 56 चीतल लाकर गांधीसागर अभयारण्य की करणपुरा बीट में छोड़े जा चुके हैं। यह चीतल भी यहां के वातावरण में अभ्यस्त हो चुके हैं।

प्रदेश के विभिन्ना अभयारण्यों में अफ्रीकन चीते बसाने की योजना के तहत देहरादून के भारतीय वन्य जीव संस्थान से आए विज्ञानी वायवी झाला व उनकी टीम ने 25 नवंबर 2020 को गांधीसागर अभयारण्य का निरीक्षण किया था। यहां का वातावरण चीतों के अनुकूल माना गया था। चीतों के लिए भोजन का इंतजाम करने के लिए ही वन विभाग ने यहां हिरण प्रजाति के चीतल को बसाना शुरू कर दिया है। राजगढ़ जिले के नरसिंहगढ़ अभयारण्य में बोमा लगाकर चीतलों को पकड़ा जा रहा है। और उसमें आने वाले चीतलों को गांधीसागर अभयारण्य लाकर छोड़ा जा रहा है। बुधवार को भी चार मादा व दो नर चीतल को गांधीसागर अभयारण्य में छोड़ा गया। वन विभाग के रेंजर पन्नाालाल रायकवार ने बताया कि गुरुवार तक कुल 50 मादा चीतल व 6 नर चीतल यहां लाए जा चुके हैं।

पहाड़, गुफाएं, घास के मैदान, सब कुछ है गांधीसागर में

मंदसौर जिले में प्राकृतिक संसाधनों पहाड़, घास के मैदान, ऊंचे पैड, छोटी झाड़ियों, कंदराएं, गुफाएं सहित पानी की प्रचुर उपलब्धि है। गांधीसागर अभयारण्य में सभी वन्य प्राणियों व पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण है। और इसी के चलते यहां चीतों को बसाने की पहली परीक्षा गांधीसागर अभयारण्य ने पास कर ली है। दरअसल भारत सरकार ने अफीका, इरान, नामीबिया या अन्य किसी देश से चीते को लाकर भारत में बसाने की प्रक्रिया शुरू की है। इसके लिए मप्र के चार अभयारण्य मंदसौर जिले के गांधीसागर अभयारण्य, श्योपुर जिले का कूनो पालपुर नेशनल पार्क, सागर का नौरादेही अभयारण्य, शिवपुरी के माधव नेशनल पार्क में से एक जगह का चीते बसाने के लिए चयन होना है। सरकार ने इन चारों जगहों को चीते की बसाहट के अनुकूल माना है। इसका फैसला करने के लिए भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून के विज्ञानी वायवी झाला अपने तीन साथियों के साथ दौरा कर चुके हैं। आठ विज्ञानियों ने घने जंगल का दौरा कर घास के मैदान देखे। इसके अलावा जंगलों का घनापन देखा, पहाड़ व कंदराएं भी देखी थीं।

पहले से ही था दावा मजबूत, विज्ञानियों ने भी जताई खुशी

मप्र में चीतों को बसाने में गांधीसागर अभयारण्य का दावा पहले से ही मजबूत लग रहा था। भारतीय वन्य जीव संस्थाकन देहरादून के विज्ञानी वायवी झाला ने भी यहां का पर्यावास चीते के लिए अनुकूल माना था हालांकि अभी परीक्षा के और भी कई चरण बाकी हैं। अलग-अलग स्तरों पर गांधीसागर अभयारण्य में टीम आएगी और सर्वे करेगी। इन सभी सर्वे की रिपोर्ट मप्र व केंद्र सरकार को भेजी जाएगी। उसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। तब जाकर तय होगा कि चीते गांधीसागर में दहाड़ेंगे या फिर अन्य अभयारण्य में।

368 वर्ग किमी में फैला है अभयारण्य

अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के बीच में बसे प्राकृतिक गांधीसागर अभयारण्य में वह सभी कुछ है जो वन्य प्राणियों के लिए चाहिए। यहां घास के मैदान है तो पहाड़ में कंदराएं हैं, इसके अलावा घना जंगल भी है। लगभग 368 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला अभयारण्य में जंगली पेड़ों में खेर, बेर, पलाश सहित अन्य प्रजातियां भी हैं। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण अथाह पानी से भरा जलाशय है। यह सभी बातें इस अभयारण्य को वन्यजीवों के रहने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराते हैं। गांधीसागर अभयारण्य में दो साल पहले आखिरी बार हुई गिनती में लगभग 50 तेंदुए मिले थे। इसके अलावा लकड़बग्घे, जंगली लोमड़ी भी काफी तादाद में हैं। बाकी छुटपुट वन्य प्राणी भी हैं। इसी साल हुई पक्षी गणना में 225 तरह के पक्षियों की प्रजातियां यहां मिली हैं।

Posted By: Nai Dunia News Network

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