महू। स्वाधीनता आंदोलन में बाबू जगजीवन राम एक सनातनी नायक के रूप में रहे। वह जितने शांत थे, उतना ही मजबूत भी थे। कुछ विषम परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी किसी के खिलाफ नफरत नहीं फैलाई। देश और लोक को प्रथम माना और सौहार्द का रास्ता चुना।

यह बात डॉ. आंबेडकर विवि में आयोजित एक वेबिनार में मुख्य वक्ता डॉ.ओमशंकर गुप्त ने कही। उन्होंने कहा कि बाबू जगजीवन राम ने राष्ट्रीय सांस्कृतिक अस्मिता के साथ देशज अस्मिता को जोड़ने का अथक प्रयास किया। उनका किसी जाति, धर्म, वर्ग, संप्रदाय से कोई दुराग्रह नहीं था। वे एक समरसता एवं समता मूलक समाज चाह रहे थे। विवि की कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने कहा कि डॉ. अम्बेडकर विवि सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय डॉ. अम्बेडकर की जन्म स्थली से उनके कार्यों, विचारों और लोक परंपराओं को समृद्घ करते हुए निरंतर गतिशील है। विश्वविद्यालय वैश्विक फलक पर स्थापित हो। इस प्रयास के साथ विश्वविद्यालय दृढ़ संकल्पित है। बाबू जगजीवन राम ने स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान समाज को जोड़ने का प्रतिम योगदान दिया है।

वेबिनार का आयोजन बाबू जगजीवन राम पीठ, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय महू तथा हेरीटेज सोसाईटी, पटना के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। वेबिनार का विषय 'बाबू जगजीवन राम के चिंतन में गाव, गरीब और किसान' था। प्रो. शुक्ला ने कहा कि बाबू जगजीवन राम का किसानों मजदूरों से संबंध में अटूट रिश्ता रहा है। विभिन्न पदों पर रहते हुए उनके चिंतन के केंद्र में सदैव गाव, गरीब और किसान ही रहे हैं। विश्वविद्यालय में स्थापित बाबू जगजीवन राम पीठ के माध्यम से उनके कार्यों को और अधिक प्रसार देने के लिए संकल्पित हैं जिससे राष्ट्र कल्याण का समरस भाव लोगों में उद्घृत हो सके। बाबू जगजीवन राम पीठ के आचार्य डॉ. शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने कहा कि बाबू जगजीवन राम ने राष्ट्रीय सांस्कृतिक अस्मिता के साथ देश की अस्मिता को जोड़ने का कार्य किया। संचालन शोध अधिकारी डॉ. रामशंकर ने किया। आभार डॉ. अनंत आशुतोष ने माना।

Posted By: Nai Dunia News Network

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