एक्सक्लूसिव

फोटो 7ए- जल संरचनाओं के काम को देखते अधिकारी।

7बी- तरुण भटनागर, सीईओ जिला पंचायत।

-बारिश के एक महीने बाद ही सूख जाती है नदी

-अब तक 180 जल संरचनाएं बनाई जा चुकी हैं ग्रामीणों के सहयोग से

मुरैना। जल संरचनाओं के जीर्णोद्धार के लिए मुरैना जिले ने राष्ट्रीय जल पुरस्कार प्राप्त किया था। इस सफलता के बाद अब जिला पंचायत ने नदी पुनर्जीवन परियोजना के तहत मुरैना की सोंह नदी -प्रचलित नाम सोन नदी- को फिर से सदानीरा करने का अभियान शुरू किया है। इसके लिए ग्रामीणों के सहयोग से नदी की जल निकलासी घाटी में 1024 जल संरचनाएं बनाएगी। ताकि नदी को बहाने वाली भूमिगत जल तंत्रिकाएं सक्रिय हो सकें। फिलहाल यह नदी बारिश खत्म होने के एक महीने बाद ही सूख कर अदृश्य हो जाती है। 3 साल की इस परियोजना के पूरा होने के बाद यह नदी फिर से सदानीरा हो जाएगी।

सोंह नदी का अंचल में प्रचलित नाम सोन नदी है। यह नदी सबलगढ़ के बेरखेड़ा गांव के पास से निकलती है और करीब 30 किमी लंबा सफर करते हुए मामचौन कैलारस के पास चंबल की सहायक नदी क्वारी में जाकर मिल जाती है। क्वारी नदी तक पानी पहुंचाने वाली इस प्रमुख नदी के सूखने से क्वारी नदी के जल स्तर पर भी प्रभाव पड़ा है। इस नदी के किनारे बसे गांव भी अब इस नदी को अनुपयोगी और हमेशा सूखी रहने वाली मान चुके हैं। लेकिन अब इन्हीं ग्रामीणों का सहयोग जिला पंचायत नदी को पुनर्जीवित करने के लिए ले रही है। इसके लिए जिला पंचायत ने मनरेगा के तहत ग्रामीणों को जल संरचनाएं बनाने का काम सौंपा है। ताकि ग्रामीणों को अस्थाई रोजगार मिले और नदी को फिर से जमीन के ऊपर लाने का श्रेय भी ग्रामीणों को मिल सके।

जून महीने से हो चुकी है शुरुआत

परियोजना के नोडल अधिकारी तिलक सिंह कुशवाह के मुताबिक नदी को जीवित करने का यह काम जून 2019 से शुरू हुआ है। नदी हर साल की तरह इस साल भी जुलाई महीने में बारिश खत्म होने के साथ ही सूख गई है। इसमें सिर्फ कुछ जगहों पर पानी ठहरा है। नदी के आसपास भी जल स्तर कम बना रहता है।

इस तरह बहती है नदी

पर्यावरण विद् भगवत दत्त पाठक के मुताबिक नदी सिर्फ जमीन के ऊपर बहने वाला तंत्र नहीं है। नदी के दो हिस्से होते हैं। यानी नदी में जितना पानी ऊपर बहता है, उससे कहीं ज्यादा जमीन के नीचे और आसपास बहता है। नदी तब सूखती है जब नदी को पानी उपलब्ध कराने वाले जलग्रहण क्षेत्र या जल निकास घाटी में पानी नहीं ठहरता और नदी के नीचे का प्रवाह कम होते होते पूरी तरह खत्म हो जाता है।

15 हजार हैक्टेयर है जल निकास घाटी का क्षेत्रफल

नदी के भूजल धारा को रीचार्ज करने के लिए इसके आसपास की 15 हजार हैक्टेयर में फैले जल निकास घाटी काम करती थी, लेकिन जंगलों की कटाई और भौगोलिक स्थिति से छेड़छाड़ के कारण यह 15 हजार हैक्टेयर की जल निकास घाटी पानी को जमीन के भीतर नहीं पहुंचा पा रही है। यही वजह है कि सोन नदी बारिश खत्म होते ही सूख जाती है।

3 करोड़ से बन चुकी हैं 180 संरचनाएं

जून महीने से शुरू हुई इस परियोजना में अब तक 3 करोड़ रुपए खर्च हो चुका है। ग्रामीणों के सहयोग से नदी की जल निकास घाटी में प्रस्तावित रोक, कच्चे बंधान आदि संचरचनाओं को मिलाकर अब तक 180 संरचनाएं बना दी गई हैं। कुल 1024 जगहों पर इस तरह की संरचनाएं प्रस्तावित हैं, जिन्हें 2022 तक पूरा कर लिया जाएगा।

19 गांवों के लिए फिर वरदान बनेगी नदी

उद्गम स्थल से लेकर क्वारी नदी में मिलने तक नदी करीब 19 गांवों की खेतिहर जमीन के आसपास से बहती है। यह नदी इस इलाके के भूजल को भी सहेजने में मुख्य भूमिका निभाती है। बीते 3 दशकों से नदी इस काम को नहीं कर पा रही। लेकिन अब इन सभी 19 गांव के लोग ही इस नदी को जीवित करने में योगदान दे रहे हैं। ये नदी एक बार फिर यहां के 22 हजार से ज्यादा किसानों की किस्मत बदलेगी।

इन पंचायतों के सहयोग से प्रकटेगी नदी

नदी को पुनर्जीवित करने में 10 पंचायत जुटी हैं, जिनके पास से यह नदी गुजरती है। इसमें सबलगढ़ विकासखंड की बेरखड़ा पंचायत, गोबरा पंचायत, मैमना पंचायत, पहाड़गढ़ विकास खंड की कन्हार पंचायत, मानपुर पंचायत और कैलारस विकास खंड की डुंगरावली, पनिहारी, देवरी, मामचौन, गोल्हारी पंचायत शामिल हैं।

कथन- फोटो

अंचल की सारी नदियां साल भर बहती हैं। लेकिन सोन नदी सूख सूख चुकी है। लोग अब इसे सोन नाला कहने लगे हैं। नदी के जलग्रहण वाले इलाके नदी तक पानी नहीं पहुंचा पा रहे हैं। इसलिए हमने 1024 जगहों पर जल संरचनाएं बनाने काम शुरू किया है, जो नदी को भूगर्भ से जीवंत करेंगे। यह नदी को जीवन देने का वैज्ञानिक तरीका है, जो जरूर सफल होगा।

तरुण भटनागर, सीईओ जिला पंचायत मुरैना

Posted By: Nai Dunia News Network