अंबाह(नईदुनिया न्यूज)।पर्यूषण पर्व के तहत जैन बगीची में तप धर्म की व्याख्या करते हुए आचार्य विन्रम सागर ने कहा कि तप देह को दंड देने की प्रक्रिया या प्रताड़ित करने की क्रिया नहीं है, आत्म शोधन का आयाम है। तपस्या के द्वारा हम पुरानी आदतों को नष्ट कर देते हैं और पूर्व में इकठ्ठा हुआ जो अच्छे-बुरे विचारों से एकत्र कचरा है उसे तप की आग में भस्म कर देते हैं। तप भयोत्पादक होता है। तप से हमारे अंदर की सहनशक्ति को बल मिलता है। मन की इच्छाओं को ध्यान और समता की प्रज्वलित अग्नि में भस्म कर देना तपस्या है, ये तप संयमी के जीवन में होता है। जमीन के अंदर गढ़ा हुआ खजाना उसे निकालने के लिए उसके ऊपर की मिट्टी को निकालकर बाहर फेकने की प्रक्रिया ही तपस्या है।

आचार्य विनम्र सागर ने कहा कि केला, आम, अमरूद को जल्द खाने के लिए उसमें गर्मी देकर पकाया जाता है। वैसे ही आत्म आनंद को पाने के लिए कर्मो में ज्ञान-ध्यान का अग्नि देकर उन्हें जलाना तपस्या है। तप करने के लिए आत्मबल और निर्भीकता की जरूरत होती है। कमजोर लोग तप को देखकर आश्चर्य करते हैं। तपस्वी लोग आनंद प्राप्त करते हैं। मन की इच्छाओं को रोककर पुरानी इच्छाओं को ध्वस्त कर के इंद्रियों को शांत करना तप है। गुरुदेव ने कहा कि तप साथना जीवन का सर्वश्रेष्ठ कार्य है। इसके बाद कोई कार्य करने को नहीं रह जाता हैं। ऐसा तप हम सभी को शक्ति के अनुसार करते रहना चाहिए। छोटे छोटे तप का फल समाधि है, तो महातप का फल मुक्ति है। हम धर्म की ठंडी आग में तपस्या नहीं कर सकें, तो संसार की दानव रूपी विषय भोग की भयंकर अग्नि में जल-जलकर कष्टों में मारेंगे। उपवास करना संयम धारण तप है। तप अपनी अशुद्ध आत्मा को स्वर्णमय शुद्ध बनाने के लिए तपाने का नाम है। कोई भी चीज गर्मी पाए बिना कभी भी शुद्ध नहीं होती, वैसे ही आत्म तप के बिना कभी भी शुद्ध नहीं होती। अतः हमें हमेशा तप ही करते रहना चाहिए।

Posted By: Nai Dunia News Network

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