हरिओम गौड़ मुरैना

इंसानों के खान-पान की चीजों पर महंगाई के कारण गरीब परिवारों के सामने पेट भरने जैसी समस्याएं कई बार देखी, सुनी और पढ़ी होंगी, लेकिन महंगाई के कारण मवेशियों का चारा छिन जाए और बेजुवान पशुओं के सामने भूखों मरने की नौबत आ आए। इस बार ऐसे हालात चंबल के पशुपालक और मवेशियों के सामने आ गए हैं। इस साल मवेशियों के भूसे के दाम इतने बढ़ गए हैं, कि वह इंसानों के आहार गेहूं और बाजरा से भी महंगा हो गया है।

चंबल अंचल में मवेशी के प्रमुख आहार में गेहूं का भूसा शामिल है। मुरैना जिले में इस बार भूसे का भाव अप्रत्याशित बढ़ोतरी करके 1900 से 2000 क्विंटल तक पहुंच गया है, जबकि गेहूं के दाम 1800 रुपये और बाजरा के भाव 1500 रुपये क्विंटल के आसपास चल रहे हैं। गरीब परिवारों को तो सरकार पीडीएस दुकान से एक रुपये किलो में बाजरा, गेहूं व चावल तक दे देती है, लेकिन गरीब पशुपालकों अपनी मवेशी के लिए चारा आसानी से नहीं मिल रहा। इसका असर यह हो रहा है, कि गरीब पशुपालक अपनी मवेशियों को मजबूरी में बेसहारा छोड़ रहा है। यह भूखी मवेशी फसलों को चौपट कर रही हैं या फिर शहर-कस्बों की ओर रुख कर रही हैं। हर साल गेहूं की फसल के सीजन में भूसे की कमी होती है, लेकिन भूसे के दाम इस साल जितने बढ़े हैं वैसा कभी नहीं हुआ। बीते साल सर्दी के दिनों में भूसा 800 से 1000 रुपये क्विंटल में बिका था। यानी इस साल भूसे के भाव दोगुने हो गए हैं। भूसे की महंगाई का असर दूध के दामों पर पड़ने के पूरे आसार हैं। जो पशुपालक दूध बेचकर अपना परिवार पाल रहे हैं, वह भूसे की महंगाई के कारण दूध को पांच रुपये लीटर तक महंगा करने की योजना बनाने लगे हैं।

ये कैसा प्रतिबंध, कार्रवाई एक भी नहीं:

भूसे का संकट तो अगस्त महीने में आई भीषण बाढ़ के बाद से ही होने लगा था, लेकिन इस संकट को राजस्थान व उत्तर प्रदेश में होने वाली भूसे की सप्लाई ने और बढ़ा दिया। राजस्थान व उत्तर प्रदेश में ईंट की चिमनियों में भूसे का उपयोग होता है। यह चिमनी मालिक 1500 रुपये क्विंटल तक में भूसा खरीदकर ले गए। दूसरे प्रांतों में भूसे की सप्लाई से मवेशियों के सामने चारे का संकट होने का मामला नईदुनिया ने 25 नवंबर के अंक में प्रमुखता से उठाया। इसके बाद कलेक्टर बी कार्तिकेयन ने 27 नवंबर को भूसे की दूसरे राज्यों में सप्लाई पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन यह प्रतिबंध कागजों में ही सीमित रहा। हर रोज दर्जनों ट्रैक्टर-ट्राली व ट्रकों में भरकर भूसा राजस्थान व दिल्ली जा रहा है, लेकिन प्रशासन, पुलिस या कृषि विभाग ऐसे एक भी वाहन पर कार्रवाई कर सका।

इन तीन कारणों से आया भूसे का संकटः

- अगस्त महीने में चंबल व क्वारी नदियों में ऐसी भीषण बाढ़ आई कि हजारों बीघा खेत व 250 से ज्यादा गांव बाढ़ की चपेट में आ गए। खेतों व गांवों में स्टाक किया गया भूसा बाढ़ के साथ बह गया या फिर भीगकर खराब हो गया।

- भूसे का उपयोग ईंट पकाने वाली चिमनियों में होने लगा है। मुरैना से सटे उप्र के सनिया-मनिया और राजस्थान के धौलपुर क्षेत्र की चिमिनयों से मुरैना से हजारों ट्राली भूसा खपा है।

- सर्दी में हो रही बारिश के कारण बाजरा की करब भींगने के कारण उसमें फफूंद लग गई, इसे खाने से जिलेभर में मवेशियों की मौत की घटनाएं सामने आईं, इसलिए बाजरा की करब को चारे में उपयोग नहीं किया रहा और गेहूं के भूसा की मांग अचानक से बढ़ गई।

वर्जन

- भूसा दो हजार रुपये क्विंटल हो गया है। इससे महंगा तो बाजरा-गेहूं है, लेकिन मवेशी का पेट उससे नहीं भूसे से भरता है। इतना महंगा भूसा खरीद नहीं पा रहे, इसलिए अपनी तीन गायों को निराश्रित छोड़ना पड़ा है। प्रशासन ने प्रतिबंध लगाया है पर भूसा तो पूरा राजस्थान-उप्र में ही चला गया।

रविन्द्र डण्डोतिया पशुपालक, बड़ोखर

- पिछले साल 800 से 1000 रुपये क्विंटल में भूसा बिका था। इस बार कहीं भूसा मिल ही नहीं रहा, इसलिए हम ही थोक में 1700 से 1800 रुपये क्विंटल खरीद रहे हैं और 1900 से 2000 रुपये क्विंटल तक में बिक रहा है। 40 साल से भूसे का कारोबार कर रहा हूं, पर ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

अशोक शर्मा भूसा, व्यवसायी

- गांवों में भूसा मिल नहीं रहा। आसपास गांवों में बाढ़ में भूसा बह गया। शहर की दुकानों पर भूसा 1800 से 2000 रुपये क्विंटल तक बिक रहा है। पशुपालकों के दूध के दाम बढ़ नहीं रहे। मवेशियों को पालना मुश्लिक हो गया है। हमें जितनी मात्रा में भूसा चाहिए उससे आधा ले जा रहे हैं, इस मजबूरी में मवेशी को भरपेट चारा नहीं दे पा रहे।

रामनाथ सिंह परमार पशुपालक, मृगपुरा गांव

Posted By: Nai Dunia News Network

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