Morena News : अनिल तोमर, मुरैना। मुरैना का नाम मयूरवन से पड़ा है। लेकिन इस शहर की बसाहट 1936 के बाद हुई है। 1936 से पहले तक इसे पेच के नाम से जाना जाता था। शहर में पुरानी जीन के पास रुई की मंडी हुआ करती थी। बस कुछ ही घर व दुकान हुआ करते थे। चूंकि 1936 से पहले मुरैना शहर में रुई की मंडी लगती थी। रुई निकालने के लिए मशीनों का उपयोग होता है। तब ग्रामीण भाषा में इन्हें पेच कहते थे। इसलिए उस समय शहर का नाम भी पेच पड़ गया। आमतौर पर गांवों के लोग मुरैना आने के लिए कहते थे कि वे पेच जा रहे हैं।

किस तरह से बना पेच से मुरैना

जिले मे मोरों की संख्या अच्छी खासी है। यह स्थिति शहर की बसाहट से पहले की ही है। इसलिए मुरैना का नाम मयूरवन पड़ा, जिसका बिगड़ते हुए नाम मुरैना हो गया। आज पूरे देश में यह शहर मुरैना के नाम से प्रसिद्घ है। हालांकि रुई की मंडी की मशीनों की वजह से शहर का नाम जो पेच पड़ा था। अब जिले में न तो कपास होता है और न ही रुई की मंडी बची है। केवल रुई की मंडी के नाम एक बस्ती है।

कपास व तंबाकू की खेती से सरसों तक

पहले अंचल में कपास व तंबाकू की खेती होती थी। लेकिन दोनों ही फसलें जिले में अब नहीं होती। फिलहाल जिला सरसों की खेती के लिए जाना है। यही वजह है कि जिले को पीले सोने की खान भी कहा जाता है। यदि मौसम व बारिश ठीक ठाक होती है तो यहां लगभग 3 लाख हैक्टेयर में सरसों की बुवाई होती है और 8 लाख मैट्रिक टन तक सरसों का उत्पादन। लेकिन मौसम व बारिश कम होने से अब सरसों का रकबा घट रहा है।

पूरे देश में प्रसिद्घ है सरसों का तेल

देश में खाने में सरसों के तेल का उपयोग सबसे अधिक होता है। चूंकि जिले में सरसों का उत्पादन अच्छा खासा होता है। इसलिए यहां का सरसों का तेल पूरे देश में प्रसिद्घ है। यही वजह है कि जिले में 60 से अधिक तो तेल की मिलें हैं और 2 हजार से अधिक स्पलेर हैं। जिनसे सरसों का तेल निकाला जाता है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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