Road Safety Campaign: मुरैना(नईदुनिया प्रतिनिधि)। सड़क हादसों में जान गंवाने या फिर जीवनभर के लिए अपाहिज होने वालों के आश्रितों को बीमा कंपनी से क्लेम की राशि के तौर पर लाखों रुपये का मुआवजा मिलता है, लेकिन यह प्रक्रिया इतनी जटिल है कि बीमा क्लेम लेने के लिए पीड़ित परिवारों को कई साल तक थानों से लेकर न्यायालयों के चक्कर काटने पड़ते हैं। मुरैना जिले में 1600 से ज्यादा ऐसे केस न्यायालयों में पेंडिंग बताए गए हैं, वहीं 240 से ज्यादा मामलों के चालान थानों में रखे हैं, जो महीनों बाद भी कोर्ट में पेश नहीं किए गए।

सड़क हादसों में घायल या जान गंवाने वाले के आश्रित परिवार को बीमा राशि तभी आसानी से मिलती है, जब हादसे के जिम्मेदार वाहन व उसके ड्राइवर का नाम-पता एफआइआर में हो। इसके अलावा हादसे की फोरेंसिंक जांच हो तो, पीड़ित परिवार को जल्द न्याय मिल जाता है, लेकिन हकीकत यह है कि मुरैना जिले में गंभीर सड़क हादसों में भी फोरेंसिक जांच नहीं करती। कई मामलों में एफआइआर भी समय पर नहीं हो पाती। हादसे के कई दिन बाद एफआइआर को एमएलसी के लिए लटका दिया जाता है। कई मामलों में सड़क हादसे में मर्ग का केस दर्ज कर, बाद में उसे हादसा बताया जाता है। जिस कारण कोर्ट ऐसे प्रकरण को शंका वाला केस मानकर चलती है। समय पर एफआइआर नहीं होने, एफआइआर में गलत जानकारी होने पर बीमा कंपनी क्लेम देने से मुकर जाती हैं। बीमा कंपनी के वकील सालों तक केस को खींच ले जाते हैं। अज्ञात वाहन द्वारा एक्सीडेंट दर्शाने पर कई पीड़ित परिवार बीमा क्लेम के लिए अपने ही किसी परिचित के वाहन को जांच के बाद केस में शामिल करा देते हैं, इसके बाद कई मामलों में क्लेम मिलता है, लेकिन वह भी पर्याप्त नहीं होता। जिन हादसों में बीमा क्लेम नहीं मिल पाता, उनमें प्रशासन सहायता राशि के तौर पर 20 से 25 हजार रुपये तक जरूर दे देता है।

इन उदाहरणों से समझें एक्सीडेंट क्लेम क्यों अटक रहेः

- सलामत पुत्र टुण्डा खां की नेशनल हाइवे पर नूराबाद के पास सड़क हादसे में मौत हो गई। पुलिस केस बना तो ट्रैक्टर ड्राइवर द्वारा हादसा करना लिख दिया। एफआइआर में न तो ट्रैक्टर का नंबर आया, नहीं ड्राइवर का। इसलिए कोर्ट में मामला अटका हुआ है।

- आगरा के गढ़ी खदोली गांव निवासी रामनरेश पुत्र रामअवतार सिंह की धौलपुर रोड पर हादसे में मौत हो गई। पुलिस ने एफआइआर में अज्ञात वाहन लिख दिया, इस कारण बीमा क्लेम तक की प्रक्रिया अटक गई है।

- दो महीने पहले सुमावली में प्रताप पुत्र साहब सिंह गुर्जर की सड़क हादसे में मौत हुई। पुलिस ने एफआइआर में ट्रैक्टर की टक्कर से मौत लिखी। ड्राइवर का नाम वाहन का नंबर तक नहीं लिखा।

- नगरा के आकाश पुत्र रामसिया कुशवाह की पोरसा रोड पर सड़क हादसे में जान चली गई। हादसे का जिम्मेदार एक कार को लिख दिया, इससे ज्यादा पुलिस जांच में और कुछ नहीं लिखा गया। इसलिए मामला अटका हुआ है।

आधे से ज्यादा यातायातकर्मी प्रशिक्षित नहीं, कैसें सुधरे सफरः

यातायात पुलिस थाने में पदस्थी से पहले आरक्षक, प्रधान आरक्षक, एएसआइ, सूबेदार से लेकर टीआइ व डीएसपी तक को प्रशिक्षण दिया जाता है। यातायात का यह प्रशिक्षक पीटीआरआइ भोपाल द्वारा दिया जाता है, लेकिन मुरैना यातायात पुलिस की हालत यह है कि थाने के 41 पुलिसकर्मियों में से आधे से ज्यादा को इस प्रशिक्षण के बारे में कुछ नहीं पता। यातायात पुलिस जाम खुलवाने, वीआइपी के लिए रूट क्लीयर करने, बिना हेलमेट वालों को पकड़कर चालान करने पर ही जोर देती है।

वर्जन

- एक्सीडेंट क्लेम में बीमा कंपनी भी अपना वकील खड़ा करती हैं, जो मामले को लंबा खींच देते हैं। पुलिस का काम चालान पेश करने तक का रहता है। कभी-कभार गाड़ी जब्त या चिन्हित होने में समय लग जाता है, इस कारण चालान पेश होने में देरी होती है।

विनय यादव, टीआइ, सिविल लाइन

- रेत से भरे ट्रैक्टर की टक्कर से मेरा भाई सुरेन्द्र घायल हो गया था। पुलिस ने अज्ञात वाहन पर केस दर्ज किया। सीसीटीवी कैमरे देखकर जांच करते तो ट्रैक्टर व आरोपी ड्राइवर चिन्हित हो सकता था, पर सही जांच नहीं हुई। इसलिए दो साल से हमारा केस कोर्ट में चल ही रहा है।

पुष्पेन्द्र कुशवाह

निवासी, उत्तमपुरा मुरैना

- गंभीर हादसों में वैज्ञानिक व तकनीकी जांच जरूरी है, जो नहीं कराई जाती। कई मामलों में पुलिस की जांच में भी लीपापोती होती है। एक्सीडेंट के अधिकांश मामलों में एफआइआर ही लेट हो जाती है, कभी पीएम रिपोर्ट तो कभी एमएलसी के नाम पर एफआइआर रोक दी जाती है। लेट एफआइआर होने पर कोर्ट ऐसे मामलों को सही नहीं मानते। ऐसे मामलों में बीमा कंपनी भी राजीनामा नहीं करता और पीड़ित पक्ष को राहत नहीं मिल पाती।

एडवोकेट अरविंद पाराशर

शासकीय अधिवक्ता भारत सरकार

Posted By: Nai Dunia News Network

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