नीमच। लगभग 500 साल पूर्व विवाद के कारण होली दहन का मुहूर्त टल गया तो रातों-रात होली का डांडा हरा-भरा हो गया। समय के साथ डांडे ने विशाल पेड़ का रूप ले लिया। तब से इसी वृक्ष रूपी होलिका की जिले के धनगांव में पूजा हो रही है।

जिला मुख्यालय से धनगांव 85 कि मी दूर है और यह जावद विकासखंड की सिंगोली तहसील में आता है। धनगांव का पुराना नाम पारा नगर था। गांव के बुजुर्गों के बताते हैं कि लगभग 500 साल पूर्व गांव में होली का दहन किया जाना था।

दहन स्थल के समीप से दो सगे भाई-बहन गुजर रहे थे, तभी उन्हें गेरियों (होली खेल रहे लोग) ने पकड़ लिया। दोनों को परेशान किया और बाद में अग्नि के सात फेरे दिलाकर शादी करवा दी। इस अनर्थ की जानकारी जब ग्रामवासियों को लगी तो उनका घटना के जिम्मेदारों से विवाद हो गया था।

विवाद की वजह से होली दहन का मुहूर्त पर टल गया। सुबह विवाद थमा तो सभी ने देखा कि डांडा हरा-भरा हो गया है। दहन नहीं होने से बाद में डांडा विशाल पेड़ बन गया। तब से गांव में होली के इस पेड़ की पूजा की जा रही है। होलिका वृक्ष गांव के ठीक बीच चामुंडा माता मंदिर के समीप है और ग्रामीणों की आस्था का कें द्र है।

एक हजार जगह होलिका दहन

जिले में करीब 1 हजार से अधिक स्थानों पर होली का दहन किया जाएगा। इनमें से अधिकांश स्थानों पर लकड़ी के प्रयोग को हतोत्साहित कर गोबर के कंडों का प्रयोग किया जाएगा। शहर में अधिकांश महिला संगठनों ने होली पर कंडों के उपयोग का संकल्प लिया है। जिले की गोशालाओं में भी होली को देख कंडों का अतिरिक्त स्टॉक कि या गया है। अब तक करीब एक दर्जन संगठन नईदुनिया के कंडों से जलाएं होली अभियान से जुड़ चुके हैं।

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