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- राजा-महाराजा के निवास स्थलों का नामोंनिशान नहीं

- देखरेख के अभाव में अस्तित्व खो रहा किला

अनिल शर्मा

रतनगढ़/नीमच। नईदुनिया प्रतिनिधि

रतनगढ़ कि ले में अब क्षतिग्रस्त दीवारें और कु छ कुंड ही शेष बचे हैं। बाकी राजा-महाराजा के निवास स्थल और अन्य हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। देखरेख के अभाव में भी कि ले के ये हिस्से दिन-प्रतिदिन अपना अस्तित्व खो रहे हैं, लेकि न फिर भी इन्हें देखने वाला कोई नहीं है।

जिला मुख्यालय से करीब 55 किमी नीमच-सिंगोली-कोटा रोड पर रतनगढ़ का प्राचीन कि ला है। महाराजा हाड़ा रतनसिंहजी के कि ले के रूप में इस कि ले को पहचाना जाता है। वर्षों पुराने इस कि ले की दशा दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। एक समय कि ले का अपना गौरवशाली काल रहा, लेकि न वर्तमान में कि ला पूर्णतः उपेक्षित है। सालों से देखरेख नहीं होने से कि ले में राजा-महाराजाओं के निवास स्थल का नामोंनिशान भी नहीं बचा है। सुरंगें और अन्य हिस्से भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।

वर्तमान में रतनगढ़ कि ले में कि ले के अस्तित्व के नाम पर सिर्फ क्षतिग्रस्त दीवारें और कु छ पुराने कुंड ही बचे हैं। धार्मिक स्थलों की देखरेख आम नागरिकों के हाथों में होने से इनकी दशा तुलनात्मक रूप से कु छ बेहतर कही जा सकती है, लेकि न यदि यही हाल रहा तो समय के साथ रतनगढ़ का कि ला कि स्से-कहानियों में ही नजर आएगा। हकीकत में इसका कोई अस्तित्व नहीं बचेगा।

आवागमन के लिए थीं सुरंगें

रतनगढ़ कि ले में आवागमन के लिए सुरंगें बनी हुई थीं। बताया जाता है कि करीब 3 से 4 फीट आकार के ये सुरंगें कि ले को चित्तौड़गढ़ और बेगूं से सीधे जोड़ती थीं, लेकि न वर्तमान में सुरंगों का नामों-निशान भी नहीं है।

कुंडों में होती थी धन-दौलत की हिफाजत

कि ले में 4 बड़े आकार के पक्के कुंड बने हैं। ग्रामीणों और इतिहास में उल्लेखित जानकारी पर यकीन करें तो इन पक्के कु ंडों में उस समय राजा-महाराजा धन-दौलत रखते थे। इसमें भरकर उनकी हिफाजत की जाती थी। ये कुंड अब भी बेहतर स्थिति में हैं।

कि ले में धार्मिक स्थल भी

रतनगढ़ कि ले में कई धार्मिक स्थल हैं। कि ले के पिछले भाग में कु छ दूरी पर प्राचीन गोरेश्वर महादेव का मंदिर है, जबकि कि ले की चहार दीवारी में एक मस्जिद और दरगाह भी है। प्राचीन राम और हनुमान मंदिर भी है। इन धार्मिक स्थलों पर आज भी लोग दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं।

रतनगढ़ कि ले की खासियत

- अरावली पर्वत श्रृंखला पर करीब 1100 फीट की ऊंचाई पर कि ला था।

- कि ले की सुरक्षा के लिए ऊंची दीवारें बनी हुई थीं। इनकी तलहटी में पानी भरा रहता था।

- कि ले के कि नारे की खाई और गड्ढों में भरे पानी में मगरमच्छ पाले जाते थे।

- दुश्मनों के हमलों से निपटने में कि ले में तैनात सैनिकों को आसानी होती थी। मगरमच्छ भी मददगार बनते थे।

- कि ले के भीतर पानी के पर्याप्त साधन थे। कभी पानी की कमी नहीं होती थी।

- कि ले से राजा-महाराजाओं के आवागमन के लिए सुरंगें बनी हुई थीं।

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एक निगाह में रतनगढ़ कि ला

अरावली पर्वत श्रृंखला की पहाड़ियों पर करीब 1100 फीट की ऊंचाई पर रतनगढ़ कि ला बना है। इसका स्थापत्य और मध्य युगीन इतिहास देखने से पता चलता है कि इस कि ले का निर्माण 15वीं-16वीं शताब्दी में कि या गया। इतिहास और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार रतनगढ़ पृथक राज्य नहीं होकर मेवाड़ राज्य के अधीन था। बेगूं ताल्लुका के अधीन इस स्थान पर हाड़ा राजपूत रतनसिंह महाराज ने सन 1354 (विक्रम संवत 1411) में इसका निर्माण कराया था। कि ले के समीप गांव की स्थापना कि ले के हाकि म द्वारा सन 1674 (विक्रम संवत 1731) में रतन तेलन के नाम पर की गई। कि ले के एक और रतनगढ़ कस्बा है, जबकि दूसरी ओर गुंजाली नदी। वर्तमान में कि ला देखरेख के अभाव में अपना अस्तित्व खो रहा है। इसकी दिन-प्रतिदिन खराब हो रही है।

फोटो-

17एनएमएच-21, रतनगढ़ कि ले की दीवारें इस तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं।

17एनएमएच-22, रतनगढ़ कि ले की दीवारें कु छ स्थानों पर अब भी बेहतर स्थिति में हैं।

17एनएमएच-23, कि ले में चार से अधिक कु ंड बने हैं। बताया जाता है कि इनमें पूर्व में राजा-महाराजा धन दौलत रखा करते थे।

17एनएमएच-24, रतनगढ़ कि ले के पीछे की ओर प्राचीन गोरेश्वर महादेव का मंदिर है।

17एनएमएच-25, कि ले की ऊंचाई से रतनगढ़ कस्बा कु छ इस तरह दिखाई देता है।

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Posted By: Nai Dunia News Network