नीमच (नईदुनिया प्रतिनिधि)।

आहार, आचार-विचार शुद्धि बिना आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता है। आहार शुद्ध हो तो आचार भी शुद्ध होते हैं। आचार शुद्ध रहते हैं तो विचार भी शुद्ध होते हैं। पुण्यकर्म के बिना मानव जीवन सार्थक सिद्ध नहीं होता है। भूलवश हुए पापों की सजा से बचने के लिए पुण्य कर्म करना चाहिए। पाप कर्मों की सजा अवश्य मिलती है। चाहे वह कोई भी आत्मा हो। जन्म, मृत्यु शाश्वत सत्य है जो जन्मा है वह मरेगा ही। यह बात साध्वी गुणरंजना श्रीजी मसा ने कही। वे बघाना शक्तिनगर स्थित श्री शंखेश्वर पार्श्व पदमावती धाम सभा भवन में आयोजित धर्मसभा में बोल रही थीं।

उन्होंने कहा कि महापुरुष सिद्ध पुरुष जीवन मरण की लालसा से दूर रहते हैं। परमात्मा ने असहाय दुखों की वेदना से छुटकारा पाने के लिए मानव जन्म दिया है। रात दिन हम एक दूसरे से झगड़ा कर रहे हैं। सरकार अतिक्रमण हटा रही है लेकिन हम पाप कर्मों का इतना अतिक्रमण कर रहे हैं। हमें विचार करना होगा। हमारा वर्तमान कांटों जैसा है। जिसे हम फूलों जैसा बना सकते हैं। संत पहले स्वयं आचरण में लाता है फिर उपदेश देता है। हम अपने कर्मों का विवरण बना नहीं पाए। कर्मों का खेल बड़ा विचित्र है। हमारा वर्तमान अच्छा होगा तो ही भविष्य अच्छा होगा। गोरा- काला रंग यह परमात्मा की देन है। कृष्ण भी काले थे। शरीर काला होना कोई बड़ी बात नहीं है। जीवन की प्रगत में गोरा- काला रंग का कोई महत्व नहीं होता है। मनुष्य दान करे तो उसका कल्याण होगा। हंसना आ गया तो जीवन गुलाब की तरह खिल जायेगा। जहां भोग है वहां रोग है। जहां वैराग्य है वहां आनंद ही आनंद है। देवता, दानव, जानवर सभी ने समझ लिया। पांचवें आरे में मनुष्य ने नहीं समझा चिंतन का विषय है। रामायण महाभारत देखने के बाद भी हम अपना जीवन सुधार नहीं पाए चिंतन का विषय है। हम सुदामा कृष्ण जैसी मित्रता नहीं कर सकते हैं। राम लक्ष्‌मण भरत जैसे भाई नहीं बन सकते हैं। महावीर की तरह मात-पिता का आदर नहीं कर सकते हैं चिंतन करें। वर्तमान भक्ति सेवा भाव में नहीं होगा तो भविष्य कभी अच्छा नहीं हो सकता है। द्रोपदी पूरे परिवार को भोजन कराने के बाद स्वयं ग्रहण करती थी। जीवन में सदैव मुस्कुराना है तो आहारचर्या शुद्ध होना चाहिए। प्रेम वात्सल्य बिना जीवन अधूरा है।

Posted By: Nai Dunia News Network

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